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Showing posts from May, 2022

राजपूत, शराब और मांसाहार

*राजपूत, शराब और मांसाहार*... """""""""""""""""""""""""""""""""" राजपूतों ने जब से मांसाहार और शराब को अपनाया तभी से मुगल से पराजित होना शुरू हुआ… राजपूतों का सिर धड से अलग होने के बाद कुल देवी युद्ध लडा करती थी… “एक षड्यंत्र और माँस और शराब की घातकता….” हिंदू धर्म ग्रंथ नहीँ कहते कि देवी को शराब चढ़ाई जाये.., ग्रंथ नहीँ कहते की शराब पीना ही क्षत्रिय धर्म है......... ये सिर्फ़ एक मुग़लों का षड्यंत्र था हिंदुओं को कमजोर करने का ! जानिये एक सच्ची ऐतिहासिक घटना… “एक षड्यंत्र और शराब की घातकता….” कैसे हिंदुओं की सुरक्षा प्राचीर को ध्वस्त किया मुग़लों ने ?? जानिये और फिर सुधार कीजिये !!              मुगल का दिल्ली में दरबार लगा था और हिंदुस्तान के दूर दूर के राजा महाराजा दरबार में हाजिर थे ।             उसी दौरान मुगल बादशाह ने एक दम्भोक्ति की “है कोई हमसे बहादुर इस दुनिया में ?”               सभा में सन्नाटा सा पसर गया ,एक...

लक्ष्मणगढ़ सीकर के शेखावत राजपूतो का इतिहास

●लक्ष्मणगढ़ सीकर के शेखावत राजपूतो का इतिहास● ●आमेर का इतिहास● कच्छवाह या कुशवाह राजपूत सूर्यवंशी क्षत्रियो की प्रमुख खाप है। परमात्मा विष्णु से यह वंश चला है, इसी वंश में महाराज वैश्वस्त मनु का जन्म हुआ था । महाराज मनु के पुत्र इक्ष्वाकु नाम के विश्वप्रसिद्ध प्रतापी राजा हुए, जिससे इस वंश का नाम इक्ष्वाकु वंश पड़ा ... इसी इक्ष्वाकुवंश में #भगवान_राम का जन्म हुआ, भगवान राम के दो पुत्र है ... ज्येष्ठ पुत्र का नाम कुश है, एवं छोटे पुत्र का नाम लव ।।  कर्नल टॉड ने कच्छवाहो के इतिहास में बहुत बड़ी भूल है ... कर्नल टॉड ने लिखा है ..  The Kacchwah or kachhwa race claims desent form kush the Second son of Rama , King Of Koshula . (  Annaals and antiques of rajsthan Vol II P.333 )  जबकि इसके उलट वाल्मीकि रामायण एवं विष्णुपुराण जैसे प्रामाणिक वैदिक पोथियों में स्पष्ठ लिख्ता है, की भगवान राम के ज्येष्ठपुत्र का नाम " कुश " था ।  भगवन् रामपत्नी सा प्रसूता दारकद्वयम् ।  ततो रक्षां महातेजः कुरु भूतविनाशिनीम् ॥ तेषां तद् वचनं श्रुत्वा महर्षिः समुपागमत् । बालचन्द्रप्रतीकाशी द...

चंद्रवंशी_क्षत्रिय_रवानी_कुल_के_राजपूतो_का_इतिहास

.     ●#चंद्रवंशी_क्षत्रिय_रवानी_कुल_के_राजपूतो_का_इतिहास● वंश - #चंद्रवंश कुल - #रवानी (पुरुवंशी,भरतवंशी,   कुरूवंशी,         #बृहद्रथवंशी) कुलदेवी - बंदी (जरा) माता कुलदेवी स्थान - #राजगीर कुल देवता- #सिद्धेश्वर महादेव गोत्र - अत्रि, #भारद्वाज प्रमुख गद्दी - राजगीर गढ़ व स्टेट - उमगा स्टेट, #रवाणगढ़, बांधवगढ़ (1 वर्ष), चुनारगढ़ (543 ई.पु), कुमाऊं वेद - यजुर्वेद उप वेद - धनुर्वेद शाखा - मध्यान्दनीय  सूत्र - कात्यायन (गृह) वर्ण - #क्षत्रिय  जाति - #राजपूत                ★#रवानी_कुल_का_इतिहास★ #रवानी_कुल_के_क्षत्रिय_राजपूतों ने 2800 वर्ष वैदक काल से लेकर कलियुग तक #मगध पर शासन किया।  रवानी कुल मगध (बिहार) को स्थापित एवं शासन करने वाला प्रथम एवं प्राचीनतम क्षत्रिय राजवंश है। रवानी (कुल) वंश #बृहद्रथ_वंश का ही परिवर्तित नाम है।  रवानी कुल की उत्पत्ति #चंद्रवंशी_क्षत्रिय_वंश से है, व इनकी वंश श्रंखला पुरुकुल की है। सबसे पहले यह कुल #पुरुवंश कहलाया, फिर #भरतवंश, फिर #कुरुवंश, फिर बृह...

भारत के प्राचीन वंश

पहला प्राचीन वंश... ब्रह्मा कुल :ब्रह्माजी की प्रमुख रूप से तीन पत्नियां थीं। सावित्री, गायत्री और सरस्वती। तिनों से उनको पुत्र और पुत्रियों की प्राप्ति हुई। इसके अलावा ब्रह्मा के मानस पुत्र भी थे जिनमें से प्रमुख के नाम इस प्रकार हैं- 1.अत्रि, 2.अंगिरस, 3.भृगु, 4.कंदर्भ, 5.वशिष्ठ, 6.दक्ष, 7.स्वायंभुव मनु, 8.कृतु, 9.पुलह, 10.पुलस्त्य, 11.नारद, 12. चित्रगुप्त, 13.मरीचि, 14.सनक, 15.सनंदन, 16.सनातन और 17.सनतकुमार आदि। स्वायंभुव मनु कुल :स्वायंभुव मनु कुल की कई शाखाएं हैं। उनमें से एक प्रमुख शाखा की बात करते हैं। स्वायंभुव मनु समस्त मानव जाति के प्रथम संदेशवाहक हैं। स्वायंभुव मनु एवं शतरूपा के कुल 5 संतानें थीं जिनमें से 2 पुत्र प्रियव्रत एवं उत्तानपाद तथा 3 कन्याएं आकूति, देवहूति और प्रसूति थे। आकूति का विवाह रुचि प्रजापति के साथ और प्रसूति का विवाह दक्ष प्रजापति के साथ हुआ। देवहूति का विवाह प्रजापति कर्दम के साथ हुआ। रुचि को आकूति से एक पुत्र उत्प‍न्न हुआ जिसका नाम यज्ञ रखा गया। इनकी पत्नी का नाम दक्षिणा था।   गौरतलब है कि देवहूति ने 9 कन्याओं को जन्म दिया जिनका विवाह प्रजापतियों से ...

महर्षि श्री अत्रि ऋषि जी के वंश में

महर्षि श्री अत्रि ऋषि जी के वंश में   अत्रि औद्दालक कृष्णात्रेय ( दुर्वासा) 4.श्वेतात्री कौशिक ( अत्रि) 6.चंदात्रेय इस तरह अत्रि वंश में 6 गोत्र हैं इसमें…. अत्रि औद्दालक कृष्णात्रेय ( दुर्वासा) 4.श्वेतात्री कौशिक ( अत्रि) अत्रि वंश के इन 5 (पांच) गोत्र के त्रिप्रवर (तीन प्रवर) थे तीन प्रवर ऋषि के नाम 1.आत्रेय 2.आर्यानानस 3.शावश्व यह तीन प्रवर ऋषि थे कृष्णात्रेय (दुर्वासा) गोत्र का परिचय विवरण कृष्णात्रेय (रोड़वाल) गोत्र : कृष्णात्रेय , अटक : दवे , जोशी वेद : यजुर्वेद शाखा : माध्यन्दिन शाखा प्रवर : 03 – त्रिप्रवर (तीन प्रवर) कृष्णात्रेय गोत्र के तीन प्रवर के नाम 1.आत्रेय 2.आर्यानानस 3.शावश्व कुलदेवी : श्री अन्नपूर्णा माताजी(श्री पीपलसा माता) कुल माता: श्री सती अनसूया माता (अत्रि ऋषि पत्नी) गणेशजी : बहुरूप- विघ्नहरराज इष्टदेव महादेव: विश्वेश्वर (काशी) ,राजनाथ राजेश्वर (रोहिडा) इष्ट देवता : अत्रि-अनसूया अंश त्रिगुणातीत श्री दत्तात्रेय भगवान भैरव: असितांग भैरव /भीषण भैरव मूल स्थान क्षेत्र: चित्रकूट – काशी( वाराणसी)- सिद्धपुर – डालवाणु – पिपलसा- रोहिडा (रोहितपुर)   सिद्धपुर (श्रीस्...
कश्यप गोत्र की कुलदेवी कौन हैं ? मां वरुणाची व मां योगेश्वरी को माना गया है। गोत्र मूल रूप से ब्राह्मणों के उन सात वंशों से संबंधित होता है, जो अपनी उत्पत्ति सात ऋषियों से मानते हैं। ये सात ऋषि थे- 1.अत्रि, 2. भारद्वाज, 3. भृगु, 4. गौतम, 5.कश्यप, 6. वशिष्ठ, 7.विश्वामित्र. बाद में इसमें एक आठवां गोत्र अगस्त्य भी जोड़ा गया और गोत्रों की संख्या बढ़ती चली गई. जैन ग्रंथों में 7 गोत्रों का उल्लेख है- कश्यप, गौतम, वत्स्य, कुत्स, कौशिक, मंडव्य और वशिष्ठ. लेकिन छोटे स्तर पर साधुओं से जोड़कर हमारे देश में कुल 115 गोत्र पाए जाते हैं. आदिकाल में लोकप्रिय ब्रह्मा ने सृष्टि की रचना करने हेतु अपने शरीर से दस मानस पुत्रों को जन्म दिया। इनमें प्रजापति ब्रह्मा की गोद से नारद, अंगूठे से दक्ष, प्राण से वशिष्ठ, त्वचा से भृगु, हाथ से क्रतु, नाभि से प्रलय, कानों से पुलस्त्य, मुख से अंगिरा, नेत्रों से अत्रि, और मन से मारीच उत्पन्न हुए। इनमें से नारद जी जैसे कुछ ऋषियों ने वर्षों तक तपस्या करने के बाद सृष्टि रचना में कोई रूचि नहीं दिखाई। तब ब्रह्माजी ने अपने शरीर के एक भाग से स्वायम्भु मनु और दूसरे भाग से शतरूप...

मुद्गल ऋषि और उत्तंक

मुदगिल ऋषि= द्वापर युग में महात्मा मुदगिल नाम के एक आदर्श ब्राह्मण सपरिवार कुरुक्षेत्र में निवास करते थे।मुदगिल पूर्ण जितेन्द्रिय ,सत्यवादी,वेदपारंगत ,सहनशील ,दयालु उदार और धर्मात्मा थे। ये शिलोन्छवृत्ति से ही अपना जीवननिर्वाह करते थे।शिलोन्छवृति का अन्न भी 28 शेर से अधिक कभी इकट्ठा नहीँ करते। घर में जो कुछ होता उसी को दीन -दुखी अतिथि -अभ्यागतों की सेवा में खुले हाथों लगते। जैसे धर्मात्मा ब्राह्मण थे ,वैसे ही उनकी धर्मपत्नी और सन्तान भी थी।मुदगिल जी सपरिवार महीने में केवल दो ही बार--अमावस्या और पूर्णिमा के दिन भोजन किया करते,सो भी अतिथि अभ्यागतों को भोजन कराने के बाद ।मुदगिल की कीर्ति सारे देश में फैल रही थी।एक बार दुर्बासा जी के मन में परीक्षा करने की आ गयी ।मर रहा है ; परन्तु किसी के भी मन मे कुछ दु:ख,क्रोध ,क्षमा या अपमान का विकार नहीँ है।दुर्वासा जी की परीक्षा में ब्राह्मण उत्तीर्ण हो गये।दुर्वासा ने प्रसन्न होकर कहा -तुम सारी परिक्षा में सफल रहे हो। उत्तंक ऋषि= आयोद धौम्य के तीसरे शिष्य वेद थे।वेद ऋषि जब विद्याध्ययन समाप्त कर चुके तो वे घर गये और वहाँ गृहस्थ धर्म का पालन करते हुए ...