मुद्गल ऋषि और उत्तंक
मुदगिल ऋषि= द्वापर युग में महात्मा मुदगिल नाम के एक आदर्श ब्राह्मण सपरिवार कुरुक्षेत्र में निवास करते थे।मुदगिल पूर्ण जितेन्द्रिय ,सत्यवादी,वेदपारंगत ,सहनशील ,दयालु उदार और धर्मात्मा थे। ये शिलोन्छवृत्ति से ही अपना जीवननिर्वाह करते थे।शिलोन्छवृति का अन्न भी 28 शेर से अधिक कभी इकट्ठा नहीँ करते। घर में जो कुछ होता उसी को दीन -दुखी अतिथि -अभ्यागतों की सेवा में खुले हाथों लगते। जैसे धर्मात्मा ब्राह्मण थे ,वैसे ही उनकी धर्मपत्नी और सन्तान भी थी।मुदगिल जी सपरिवार महीने में केवल दो ही बार--अमावस्या और पूर्णिमा के दिन भोजन किया करते,सो भी अतिथि अभ्यागतों को भोजन कराने के बाद ।मुदगिल की कीर्ति सारे देश में फैल रही थी।एक बार दुर्बासा जी के मन में परीक्षा करने की आ गयी ।मर रहा है ; परन्तु किसी के भी मन मे कुछ दु:ख,क्रोध ,क्षमा या अपमान का विकार नहीँ है।दुर्वासा जी की परीक्षा में ब्राह्मण उत्तीर्ण हो गये।दुर्वासा ने प्रसन्न होकर कहा -तुम सारी परिक्षा में सफल रहे हो।
उत्तंक ऋषि= आयोद धौम्य के तीसरे शिष्य वेद थे।वेद ऋषि जब विद्याध्ययन समाप्त कर चुके तो वे घर गये और वहाँ गृहस्थ धर्म का पालन करते हुए रहने लगे।उनके भी तीन शिष्य हुए।वेदमुनि को राजा जनमेंजय और राजा पौष्य ने अपना राजगुरु बनाया। वेदमुनि का प्यारे शिष्य उत्तंक से कहा---'वेटा ! मेरे घर में जिस चीज की ज़रूरत हो,उसका प्रबन्ध करना।मेरी अनुपस्थिति में तुम्ही सब कामों को करना,।" उत्तक ने गुरु की आज्ञा शिरोधार्य की,गुरु चले गये।गुरुपत्नी ने कहा,तुम ऐसा काम करो ऋतुकाल व्यर्थ ना जाए।उत्तंक ने डब यह बात सुनी तो उसने बड़ी नम्रता से कहा--" गुरु जी मुझसे अनुचित कार्य करने को नहीँ कह गये है।ऐसा कार्य मे कभी नहीँ करुँगा"। कालान्तर में जब गुरु लौटे तो अपने शिष्य के सदाचारमय बर्ताव कों सुनकर वे बड़े प्रसन्न हुए और सर्व शास्त्रविद् होने का आशीर्वाद दिया।तब गुरु नें कहा---"आच्छा" भीतर जाकर गुरु पत्ती से पूछ आओ।उसे जो प्रिय हो वही तुम कर दो,यही तुम्हारी गुरुदक्षिणा है।' यह सुनकर उत्तंक भीतर गये और गुरु पत्ती से प्रार्थना की,तब गुरु पत्ती ने कहा--"राजा पौष्यकी रानी जो कुन्डल पहने हुए है उन्हें मुझे आज से चौथे दिन पुण्यक नामक व्रत के अवसर पर अवश्यं ला दो। उस दिन मे उन कुण्डलों को पहनकर ब्राह्मण को भोजन कराना चाहाती हूँ।" यह सुनकर उत्तंक ऋषि गुरु और गुरु पत्ती को प्रणाम करके पौष्य राजा की राजधानी को चल दीये।राजा ने कहा--"आप स्न्नातक ब्रह्मचारी है।स्वयं ही जाकर रानी से कुण्डल माँग लाइए।" यह सुनकर उत्तंक राजमहल में गये,वहाँ उन्हें रानी नहीँ दीखीं।तब राजा के पास आकर बोले--महाराज !!क्या आप मुझसे हँसी करते है? रानी तो भीतर नहीं है।" तब राजा ने कहा---"ब्रह्मण! रानी ही हैं।ज़रूर आपका मुख उच्छिष्ट है।सती स्त्रीयाँ उच्छिष्ट पुरुषको,दुष्टको दिखायी नहीँ देतीं"। उत्तंक को अपनी गलती मालूम हुई ।उन्होंने हाथ -पैर धोकर प्राणायाम करके तीन बार आचमन किया।तब वे भीतर गये। वहाँ जाते ही रानी दिखाई दीं।याचना की की गुरु पत्ती के लिए आप से कुण्डल लेने आया हूँ।"रानी ने कुण्डल लेने आया हूँ ।रानी ने कुण्डल उतार कर दे दिए और कहा सपों का राजा तक्षाक इनकी तलाश में सदा धूमता रहता है।सावधानी से ले जाना ।गुरु पत्ती ने कुण्डल लेते ही आर्शीबाद दिया-तुम्हें सब सिद्धियां प्राप्त हों ।उतंक बड़े ही प्रतापी ,तपस्वी ज्ञानी ऋषि थे।।
शुक्राचार्य ऋषि:=
भगवान ब्रह्माजी के तीसरे मानसिक पुत्र भृगु हुए। इन भृगु के कवि हुए और कवि के असुर गुरु महर्षि शुक्राचार्य हुएय ये योगविद्या में पारंगत थे। इनकी शुक्रनीति बहुत प्रसिद्धि है। यद्यपि ये असुरों के गुरु थे।किन्तु मन से भगवान् के अनन्य भक्त थे असुरों मे रहते हुए भी ये उन्हें सदा धार्मिक शिक्षा देते रहते थे।इन्हीं के प्रभाव से प्रहाद,विरोचन,बलि आदि भगव् भक्त बने और श्रीविष्णु के प्रीत्यर्थ नानान यज्ञ ,याग अदि करते रहे ।इनको पास मृतसंजीवनी विद्या थी। हससे संग्राम मे मरे हुए असुरो को वाचा लेते थे।बृहस्पतिजी के पास यह विद्या नहीँ थी।इसलिए उन्होंने अपने पुत्र कच को इनके पास वह विद्या सीखने के लिए भेजा ।इन्होंने उसे बृहस्पतिजी का पुत्र जानकर बड़े ही स्नेह से वह विद्या सिखायि। असुरों को जब यह बात मालूम हुई तो उन्होंने कई बार कच को जान से मार डाला ,किन्तु शुक्रचार्य जी ने अपनी विद्या के प्रभाव से उसे फिर जीता ही बुला लिया।अन्य मे दैत्यो ने कच को मारकर उसकी राख को शुक्रचार्य जी को धोखे मे सुरा के साथ पिला दी।ऋषि ने ध्यान से देखा और कच से कहाँ मैं तुझे पेट में ही विद्या सिखाता हूँ मेरा पेट फाडकर निकल आ,फिर मुझे जिला लेना। कचने ऐसा ही किया। बह सिद्ध हो गया।।
नर नारायण ऋषि:=
भगवान विष्णु ने धर्म की पत्ती मृर्तिसे नर और नारायण नाम के दो ऋषियो के रूप में अवतार ग्रहण किया। वे बदरी -बन मे रहकर निरन्तर तपस्या किया करते है।उनकी तपस्या से ही संसार में धर्म -भक्ति - एवं ज्ञान का विस्तार होता है।उन्हीं की तपस्या के फल स्वरुप संसार में यत्कित्रित् सुख शान्ति के दर्शन होते है। बहुतसे ऋषि -मुनियों ने उनसे उपदेश ग्रहण किया है।और अब भी भगवान पुरुष उनके चरणों का दर्शन प्राप्त करके अपने जीवन का लाभ लेते एवं परम कल्याण का सम्पादन करते है।और तपस्या को आदर्श मानकर अपने जीवन को भी वैसी ही तपस्या में लगाने की चष्टा करते है नारद ,व्यास उद्धव आदि महाभागवत भी वहीं निवास करते है।और अधिकारी पुरुषों को उनके दर्शन भी होते है।एकवार उनकी उग्र तपस्या को देखकर इन्द्र के मन में शंका हुई कि ये कही मेरे स्वर्ग का राज्य लेने के लिये तो तपस्या नहीँ करते और अपनी झूठी धारणा के वंश होकर उन्होंने अप्सरा,काम बसन्त ,शीतल मन्द सुगंध वायु आदि को उन्हें तपस्या से च्युत करने के लिए भेजा और उन्होंने जाकर उन्हें तपस्या से च्युत करने की चेष्टा की ।उनकी नानाप्रकार की चेष्टाओं को देखकर जब वे जरा भी विचलित न हुए तब काम ,अप्सरा एवं वसंत आदी भयभीत हो कर थर-थर कांपने लगे।।
अगस्त्य ऋषि:=
महर्षि अगस्त्य वेदों के एक मन्त्रद्रष्टा ऋषि है।इनकी उत्पति के सम्बन्ध में विभिन्न प्रकार की कथाएँ मिलती है। कहीं मित्र वरुण के द्वारा वषिष्ट के साथ घड़े में पैदा होने की बात आती है। तो कही पुलस्त्य की पत्ती हविर्भू के गर्भ से विश्रवा के साथ इनकी उत्पति का वर्णन आता है।किसी -किसी ग्रंथ के अनुसार स्वयम्भुव मन्वन्तर में पुलस्त्यनतय दतोलि ही अगस्त्य के नाम -से प्रसिद्ध हुए ।ये सभी कल्पभेद से ठीक उतरती है।इनके विशाल जीवन की समस्त घटनाओं का बर्णन नही किया जा सकता। यहाँ संक्षिप्तः दो - चार घटनाएँ का उल्लेख किया जाता है।एक बार विन्ध्याचल ने गगनपथगामी सूर्य का मार्ग रोक लिया।इतना ऊँचा हो गया कि सूर्य के आने -जाने का स्थान ही न रहा ।सूर्य महर्षि अगस्त्य के शरणागत हुए। अगस्त्य ने उन्हें आस्वासन दिया और स्वयं विन्धाचल के पास उपस्थित हुए ।विन्धाचल ने बड़ी श्रद्धा-भक्ति से उन्हें नमस्कार किया।महर्षि अगस्त्य ने कहा--भैया ,मुझे तीर्थं मे पर्यटन करने के लिए दक्षिण दिशा में जाना आवश्यक है। परन्तु तुम्हारी इतनी ऊँचाई लाघ कर जाना बड़ा कठिन प्रतीत होता है,इसलिए कैसे जाऊँ ।उनकी बात सुनते ही विन्धाचल उनके चरणो मे लौट गया बड़ी सुगमता से महर्षि अगस्त्य ने उसे पार करके कहा कि अब जब तक मैं न लौटूं तुम इसी प्रकार पड़े रहना।विन्धाचल ने बड़ी नम्रता और प्रसन्नता के साथ उनकी आज्ञा शिरोधार्य की। तब से महर्षि अगस्त्य लौटे ही नहीँ और विन्धाचल उसी प्रकार पड़े हुआ है। अगस्त्यने जाकर उजयिनी नगरी के शूलेश्रवर तीर्थ की पूर्व दिशा में एक कुण्ड के पास शिवजी के आराधना की।भगवान शिव ने प्रसन्न होकर उन्हें प्रतक्ष दर्शन दिया।आज भी भगवान शंकर कि मूर्ति अगस्त्यश्रर नाम से प्रसिद्धि है।उन्होंने विदर्भराज से पैदा हुई अपूर्व सुन्दरी और परम पतिब्रता लोपामुद्रा को पत्ती के रूप मे स्वीकार किया।उस समय इल्वल और वातापी नाम के दो दैत्यों बड़ा उपद्रव मचा रहा था। वे ऋषियों को अपने यहाँ निमंत्रित करते और स्वयं भोजन बन जाता और जब ऋषिलोग खा पी चुकते तब इल्वल बाहर से उसे पुकारता और वह उनका पेट फाड़कर निकल आता । इस प्रकार महान ब्राह्मण संहार चल रहा था। भला महर्षि अगस्त्य इसे कैसे सहन कर सकते थे वे भी एक दिन उनके यहाँ अतिथि के रूप में उपस्थित हुए और फिर तो सर्वदा के लिये उसे पचा गये। इस प्रकार लोक कल्याण हुआ ।
एकवार जब इन्द्र ने वृत्रासुर को मार डाला तब कालेय नाम के दैत्य ने समुद्र के आश्रय लेकर ऋषि-मुनियों का विनाश करना शुरू किया।वे दैत्य दिन मे तो समुद्र मे रहते और रात में निकल कर पवित्र जंगल मे रहने वाले ऋषियों को खा जाते। उन्होंने वशिष्ट ,च्यवन ,भरद्वाज सभी के आश्रमों पर जा जा कर हजाररों की संख्या में ऋषि मुनियों का भोजन किया था।अब देवताओं ने महर्षि अगस्त्य की शरण ग्रहण की और सुरक्षा पाई।क्रतु ऋषि ने अगस्त्य के पुत्र इध्मवाह को गोद लेकर बंश चलाया ।इसी को अगस्त्य की ब्राह्मण बंश कहा गया।।
अष्टवक्र ऋषि:=
भगवान अष्टवक्र के सम्बन्ध में पुराणो मे ऐसी कथा आती है कि जब ये गर्भ में ही थे तभी इन्हे समस्त वेदों का बोध था । इनके पिता कुछ अशुद्ध पाठ कर रहे थे।इन्होंने गर्भ में से ही कहा अशुद्ध पाठ क्यो करते हो पिताजी को यह बात कुछ बरी लगी ।उन्होंने शाप दिया कि अभी से तू इतना टेढा है तो जा,तू आठ जगहसे टेढा हो ।पिता का वचन सत्य हुआ और ये आठ स्थान से टेठे ही पैदा हुए।इसलिए इनका नाम अष्टबक्र पड़ा इन्होंने फिर विधिवत् वेद-वेदान्ताका अध्ययन किया।उन दीनो महाराज जनक के यहाँ एक एक पुरोहित रहता था।उसने यह नियम बना लिया था कि जो शास्त्रर्थमें मुझसे हार जायेगा उसे मैं जलमें डुबा दूँगा ।बडे-2 पण्डित जाते और हार जाते।हारनेपर वह पण्डितों को जलमें डुबा देता। अष्टवक्रजी के पिता-मामा आदि भी इसी तरह जलमे डुबो दीये गये।अष्टबक्र को देखकर सभी हँस पड़ें। अष्टवक्रजीने कहा था हम तो समझते थे कि विदेह-राजकी सभा में कुछ पण्डित भी होंगे किन्तु यहाँ तो सबचर्मकार ही निकले।यह सुनकर सभी उनके मुख की और देखने लगे।राजाने पुछा आपने सभी को चर्मकार कैसे बताया,यहाँ तो बड़े -2 क्षत्रिय ,ब्रह्मनिष्ट ब्राह्मण पण्डित है।आप चर्मकार कहने का आभिप्राय बताईये।अष्टबक्रजीने कहा--देखों आत्मा नित्य है,शुद्ध है,निलेंप और निर्विकार है। उसमें कोई बिकार नही,दोष नहीँ।वह मुझमें है।जिसे उसकी परीक्षा है।वही ब्रह्म ज्ञानी है पण्डित है।उसे न पहचानकर जो चर्मसे ढ़के उस आत्माका तो बोध है नहीँ चर्म का बोध है।जिसे चर्मका बोध है वही चर्मकार है।इनकी ऐसी युक्ति युक्त बातें सुनकर महाराजको तथा समस्त सधासदोंको बड़ा संतोष हुआ। उन्होंने इनका अभिनंदन किया,पूजा की और आनेका कारण पुछा। उन्होंने कहाँ--"मैं आपके उस पण्डित से शास्त्रर्थ करूँगा जो सब को जलमे डुबा देता है। शास्त्रर्थ से महाराज ने इन्हें बहुत मना किया,किन्तु ये माने ही नहीँ।विवश होकर महाराज ने उसे पण्डितको बुलाया।इन्होंने उससे शास्त्र किया और शास्त्रार्थ मे उसे परास्त र दिया।तब तो वह घबड़ाया इन्होंने उसे पाकर लिया और कहा जैसे तैने सबको जल -मे डुबोया है उसी प्रकार मे तुझे जलमें डुबोउगाँ ।यह सुनकर पण्डित ने डुबाए सभी पडितो को बर्रा देवता से जीवित कराया।।
रैवततक ऋषि:=
महर्षि रैवतक रैवत मन्वन्तरमे हुए थे।इनका कोई विशेष चरित्र नहीँ मिलता हाँ,गुरुपरम्पराके आधारपर इतना कहा जा साकता है की अवधूत दतात्रेयसे दीक्षा प्राप्त करके इन्होंने परमसिद्धि प्राप्त की थी।ये सनस्त मन्त्रोंके रहस्यवेता थे। अपने अद्वेतस्वरूपमे ही तल्लीन रहने के कारण इनकी अधिक प्रसिद्ध नहीँ हुई होगी,ऐसा अनुमान होता है।हमें उन्हीं महात्माओं का पता चलता है जो लोक कल्याणके काममें स्पष्टरुप से भाग लेते है।जो सर्वदा परमार्थवस्तुमे ही स्थित रहते है अथवा संकल्पमात्रसे ही जगत्'का कल्याण सम्पादन करते रहते है उन्हें कोई विरले ही जान पाते है।महर्षि रैवतक भी ऐसे ही थे।इनकी एकान्तसाधना,आत्मचिन्तन तथा स्वरुपनिष्टा इस प्रकार बढ़ी हुई थी कि इन्होंने जग'तकी और आँख उठाकर देखा ही नहीँ।सर्वदा अपने आपमें ही मस्त रहे।वेदके मन्त्रद्रष्टाओमें इनका नाम आता है,परन्तु सर्व साधारणसे दूर रहने के कारण इनका चरित्र लुप्त हो गया।।
वैशम्पायन और याज्ञवल्कय :- महामुनि वैशाम्पायन जी वैदोंके आचार्य थे। उनके यहाँ बहुत से वेदाध्ययन करते थे। याज्ञवल्वयजी भी इनके ही समीप पढ़ते थे। याज्ञवल्क्य जी इनके बहिने के लड़के थे।और मिथिलापुरी मे रहते थे। एक वार समस्त ऋषियोंने मिलकर मेरु के समीप एक सभा स्थापीट की। उस सभामें यह नियम था कि मिश्रित तिथिको जो ऋषि उस सभामें उपस्थित न होगा उसे सात दिन तक वाचिक ब्रहाहत्याका पातक लागेगा ।नियमानुसार उन्हें वाचिक ब्रहाहत्याका पाप लगा। उन्होंने समस्त विद्यार्थियों से कहाँ--तुम सब मिलकर इस अपराधका प्राश्रचित कर लो। वैशम्पायनजी ने बहुत कहाँ--नहीँ भाई ! सबको मिलकर ही करना चाहिए ।किन्तु याज्ञवल्यक जी हठ पकड़ गये कि नहीँ मे अकेला ही करूँगा।तब गुरुको कुछ क्रोध आया और कहाँ तू बड़ा अभिमानी है, अतः मेरे द्वारा पढ़ी हुई यजुर्वेदकी शखाको उगल दे।गुरुकी आज्ञा पाकर याज्ञवल्क्य जी ने अनपरुपमें वे सब ऋचाएँ उगल दी। उन्हें उनके शिष्योने वितिर,बनकर ग्रहन कर लिया,वहीं यजुर्वेद में "कृष्णयजुः " के नाम से प्रसिद्ध हुई। इसी से कृष्णयजुः और शुकयजुः , ये दो भेद हुए। उस शाखाके पढ़ने वाले ब्राह्मण तैतिरीय कहलाये। तब याज्ञवल्क्य जीने निश्चय किया कि अब कभी किसी मनुष्योंको गुरु नहीँ बनाऊँगा। यह निश्चय करके वे सूर्य भगवान की आराधना करने लगे। सूर्यभगवान ने अरका रूप धारण करके उन्हें उपदेश दिया,वही माध्यन्दिन वाजसनेय ,के नामसे शाखा प्रसिद्ध हुई।इनके दो स्त्रियाँ थी …मैत्रेथी और कात्यामनी। मैत्रेयीने भगवान याज्ञवल्क्यसे ब्रह्माविद्या प्राप्त करके परमपद प्राप्त किया और दूसरी भरद्वाजकी कन्या कात्यायनी से चन्द्रकान्त ,महामेघ,विजय नाम तीन पुत्र हुए। श्रोत्रिय होने के साथ -ही-साथ ब्रह्मानिष्ट भी थे।एक बार महाराज जनक की इच्छा हुई कि हाम किसी ब्रह्मानिष्ट गुरुसे ब्रह्माविद्या प्राप्त करें। सर्वेतम ब्रह्मानिष्ट ऋषिकी परीक्षा करने के लिए उन्होंने एक युक्ति सोची।समस्त बड़े-2 ऋषियों को उन्होंने बुलाया और सभामें बछड़े सहित हज़ार सुवर्णकी गैएँ खड़ी कर दी।तदन्तर उन्होंने समस्त ऋषियों के सामने घोषणा की--जो कोई ब्रह्मानिष्ट हों वे इन गैओंको सजीव बनाकर ले जाएँ।याज्ञवल्क्य ब्रह्मा ज्ञानी, कर्मकाण्डी , स्मृतिकार आदि सभी है। इनके याज्ञवल्वयशिक्षा ,प्रतिज्ञासूत्र,याज्ञवल्वय-स्मृति,शतपथ ब्राह्मण और योगी याज्ञवल्वय , ये ग्रन्थ बहुत प्रसिद्ध है। बृहदारन्यक उपनिषद इनके शास्त्रार्थका बहुत लंबा वर्णन है।ब्रह्मावादिनी गार्गी के साथ इनका जो शास्त्रार्थ हुआ वह बड़ा ही अपूर्ब है। वैशम्पायनजी कर्मकाण्ड के आचार्य होने के साथ ही भगवत लीलाओं के बड़े रसीक थें।महाराज जन्क के यज्ञमें इन मामा-भानजोंमें कुछ कहा सुनी भी हो गई थी।किन्तु उन्होंने जब सुर्य से संहिता प्राप्त कर ली तब वैशाम्पायनजी परम प्रसन्न हुए और आपने शिष्योंको भी उन्होंने याज्ञवल्क्यजीसे वह संहिता पढ़वायी ।इन्होंने अन्तमें घर छोड़कर विद्वत्संन्यास ग्रहण कर लिया था।याज्ञवल्कयके पन्द्रह शिषों के नामों से शुक यजुर्वेदकी शाखाएँ प्रसिद्ध हुई।।
::शाडिंल्य ऋषि::
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काश्यपवंशीय महर्षि देवलके पुत्र ही शाडिंल्य नाम से प्रसिद्ध थे। ये रघुवंशीय नरपति दिल्ली के पुरोहित थे। इनकी एक संहिता भी प्रसिद्ध है। कहीं -2 नन्दगोपके पुरोहितके रुपमें भी इनका वर्णन आता है। शतानीकके पुत्रेष्टियज्में ये प्रधान ऋत्विक थे। किसी-2 पुराणामें इनका ब्रह्मा के सारथि होने का भी वर्णन आता है। इन्होंने प्रभासक्षेत्र में शिव-लिग स्थापित करके दिव्य शतवर्षतक घोर तपस्या और प्रेमपूर्ण आराधना की। फलस्वरुप भगवान शिव प्रसन्न हुए और इनके सामने प्रकट होकर इन्हें तत्वज्ञान ,भगन्द्रभक्ति एवं अष्टसिद्वियों का वरदान दिया। विश्वामित्र मुनि तब राजा त्रिशंकुसे यज्ञ करा रहे थे।तब ये होता के रूप में वहाँ विद्यमान थे।भीष्म की शरशययाके अवसरपर भी इन्हींके पुत्र थे।जैसे भगवान वेदव्यासने समस्त श्रुतियोंका समन्वय करने के लिए ज्ञानपरक ब्रह्मासूत्रों का प्रणयन किया है।वैसे ही श्रुतियों और गीता का भक्तिपरक तात्पर्य निर्णय करने के लिए इन्होंने एक छोटे से किन्तु अत्यन्त महत्वपूर्ण ग्रंथ भक्तिसूत्रों का प्रणयन किया है। उसमें कुल तीन अध्याय है।और एक-2 अध्यायमें दो-2 आहिक है। इससे सूचित होता है कि उन्होंने इस ग्रंथ का निर्माण छः दिन में किया होगा । उनके मतमे जीवोंका द्रहामणवापन होना ही मुक्ति है जीव ब्रह्म से अत्यन्त अभिन्न है उनका आवागमन स्वभाविक नही है। किन्तु जपाकुसुम-के सानिध्यसे स्फटिकमणिका लालिमा के समान अन्तःकरण की उपाधिसे ही होता है। किन्तु केवल औषधि क होने के कारण ही वह ज्ञानसे नहीँ मिटाया जा सकता,उसकी निवृति तो उपाधि और उपाधेय एक ही निवृति से या सम्बन्ध छूट जाने से चाहे जितना ऊँचा ज्ञान हो ,किन्तु जैसे स्फटिकमा जपाकुसुमका सानिध्य ज्ञान हो , किन्तु जैसे स्फटिकिशोर और जपाकुसुमका सानिध्य रहते लालिमाकि निवृति नहीँ हो सकती है।वैसे ही जबतक अन्तः करण है तब तक न हो उपाधि और उपाधेयका सम्बन्ध छुडाया जा सकता और न आवागमनसे ही बचा जा सकता है।अतः उपाधिके नाशसे ही भ्रमकी निवृति हो सकती है,आत्मज्ञानसे नहीँ।उपाधि -नाशके लिये भगवत भक्ति से बढ़कर और कोई उपाय नहीँ है।इसप्रकार महर्षि शाण्डिल्यने भगवत भक्ति की उपयोगिता और ज्ञानकी अपेक्षा भी श्रेष्ठता सिद्ध की है। भक्तिके प्रकार ,उसके साधन और उसके विध्रोंकी निवृति आदिका बडा सुस्पष्ट दार्शनिक विवेचन किया है।भगवात भक्ति प्रेमियों को उसका अध्ययन करना चाहिये।।
महर्षि कश्यप
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समस्त लोकों के पितामह भगवान् ब्रह्मा ने ही इस चयाचर सृष्टि को उत्पन्न किया है। सृष्टि की इच्छा से उन्होंने छः मानसिक पुत्र उत्पन्न किये--जिनके नाम मरीचि,अत्रि,अंगिरा,पुलस्त्य ,पुलह और क्रतु है। मरीचि के पुत्र कश्यप हुए। दक्ष प्रजापति ने अपनी तेरह कन्याओं का विवाह इनके साथ कर दिया।उनके नाम ये हैं ----अदिती
दिति
दनु
काला
दनायु
सिंहिका
क्रोधा
प्राधा
विश्वा
विनता
कपिला
मनु और
कद्रु
इन सबकी इतनी सन्तानें हुई कि उन्हीं से यह सम्पूर्ण सृष्टि भर गयी। अदिती से समस्त देवता तथा बारह आदित्य हुए।सभी दैत्य दिति के पुत्र हैं। दनु के दानव हुए। काला और दनायु के भी दानव ही हुए।सिँहिका से सिंह-व्याघ्र हुए। क्रोधा के क्रोध करने वाले असुर हुए। विनता के गरुड,अरुण आदि छः पुत्र हुए। कद्रु के सर्प,नाग आदि हुए। मनु से समस्त मनुष्य उत्पन्न हुए।इस प्रकार समस्त स्थावर-जंगम,पशु-पक्षी, देवता-दैत्य,मनुष्य----हम सब सगे भाई है। एक कश्यप भगवान् की ही हम सन्तान है।वृक्ष,पशु,पक्षी, हम सब कश्यप गोत्र ही है।इन तेरह कन्याओं मे "अदिती" भगवान कश्यप की सबसे प्यारी पत्ती थी। उन्हीं से इन्द्र आदि समस्त देवता हुए ओर भगवान वामन ने भी इन्हीं के यहाँ अवतार लिया।इनका तप अनन्त है,इनकी भगवद भक्ति अटूट है।ये दम्पति भगवान के परम प्रिय है।तीन बार भगवान ने इनके घर अवतार लिया।अदिती और कश्यप के महातप के प्रभाव से ही जीवों को निर्गुण भगवान के शगुन रूप में दर्शन हो सके।
भगवान जिनके पुत्र बने,उनके विषय में अधिक क्या कहा जा सकता है? भगवान कश्यप की पुराणों में बहुत सी कथाएँ है।यहाँ उनके सम्बन्ध में इतना ही कहना पर्याप्त होगा कि ये महानुभाव अपने भक्तिबल से भगवान् को निर्गुण से शगुन साकार बनाने वाले है तथा हम जीवों के आदि पिता है।।
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च्यवन ऋषि:-
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लोकप्रजापाते भगवान् ब्रह्माजीने वरुणके यज्ञमें एक पुत्र उत्पन्न किया, जिनका नाम " भृगु " था। भृगु महर्षिने पुलोमा नामवाली स्त्रीके साथ विधिवत् विवाह किया, पुलोमा जब गर्भवती थी तभी उन्हें एक प्रलोमा नामवाला राक्षस सुकरका रूप बनाकर उठा ले गया। पुलोमा रोती जाती थी। तेज दौडने के कारण ऋषिपत्नीका गर्भ च्यवित हो गया, एक महातेजस्वी पुत्र उत्पन्न हुआ। उस पुत्रको देखते ही वह राक्षस उसके तेजसे भस्म हो गया। वे ही महर्षि च्यवन हुए। भृगु के पुत्र च्यवन बड़े ही तपस्वी,तेजस्वी और ब्रह्मा निरत हुए। वे सदा तपस्यामें ही लगे रहते थे। तपस्या करते करते उनके ऊपर दीमक जम गयी थी।और दीमक के एक टीले के नीचे वे दब गये थे,केवल उनकी दो आँखें दिखायी देती थी। एक दिन महाराज शर्याति अपनी सेना के सहित वहाँ पहुँचे। सैनिकोंने जंगल मे डेरे डाल दीये ,हाथी- घोड़े यथास्थान बाँधे गये और सैनिक इधर उधर घूमने फिरने लगे। महाराज शर्यतिकी पुत्री सुकन्या अपनी सखियोंसहित जंगल मे घूमने लगी। घूमते घूमते उसने एक टीला देखा,बहाँ पर वह वैसे ही विनोद के लिए बैठ गये। उसे दो जुगुनू की तरह चमकती हुई आखे उस दीमक के टीले के नीचे दिखाई दी। बाल्यकाल की चपलताके कारण उसने उन दोनों आँखो मे काँटा चुभो दिया। उसमें से रक्त की धारा बह निकली। कन्या डर गयी और भागकर अपने डेरे में आ गई। डरते डरते सुकन्याने अज्ञानवश एक अपराध मुझसे हो गया है। ---टीमकके ढेरमें दो जुगुनु से चमक रहे थे ,उनमे मैने काटा चुभो दिया। सुकन्या अपनी पति की सेवा मे रह गयी। राजा उसे समझा कर अपनी राजधानी चले गये। च्यवन स्वभाव कुछ कड़ा था। किन्तु साध्वी सुकन्या दिन-रात सेवा करके उन्हें सदा सन्तुष्ट रखती थी । एक बार देवताओं के वैद्य अश्विनीकुमार भगवान च्यवन आश्रमपर आये। अत्रि ओंकार च्यवन मुनिने उनका विधिवत् सत्कार किया ।ऋषि के आतिथ्याको स्वीकार करके अश्विनी कुमार ने कहा--बहन् हम आपका क्या उपकार करें । च्यवन मुनिने कहा---देवताओं तुम सव कुछ कर सकते हो ।तुम मेरी इस वृद्धावस्थाको मेंट दो और मुझे युवावस्था प्रदान करो, इसके बदले मैं तुम्हे यज्ञमें भाग दिलाउँगा ।अभी तक तुम्हे यज्ञ में भाग नहीँ मिलता है। अश्विनीकुमार ने ऋषिकी आज्ञा मानकर एक सरोवर निर्माण किया और बोले--आप इसमे स्नान की जीये। और वृद्ध अवस्था जाती रही ।इनके पुत्र प्रमति , उनके रुरु और उनके शुनक हुए जो भारगव कहाँए।।
आइये जानते है आज भगवान गौतम बुद्ध के बाडे में ।
गौतम वंश
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गोत्र= गौतम
प्रवर= गौतम, अंगिरस,अप्यसार,बाईस्पत्य,नैध्रुव
वेद= यजुर्वेद
शाखा=माध्यन्दिनीय
सूत्र=पारस्कर गृझ सूत्र
नदी= गंगा
सूर्य पुत्र इक्ष्वाकुवंशीय राजा "निमि" ने निमिपाल नामक वंश बसाया,जो कालान्तर में नेपाल हो गया…
कौन हैं निमि ,,??आईये जानते है……
निमि वंश
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गोत्र--वशिष्ट
प्रवर---वशिष्ट,अत्रि,सांकृति
वेद----यजुर्वेद
शाखा--माध्यन्दिनीय
सूत्र --पारस्कर गृझ सूत्र
गुरु--गौतम
कुलदेवी--चण्डिका
प्राचीन गद्दी=मिथिला
यह वंश वैवस्वत मनु की एक सन्तान निमि की औलाद हैं। महाराजा निमि के ज्येष्ठ पुत्र का नाम मीठी था मीठी ने अपने नाम पर मिथिला नगरी बसाकर आपनी राजधानी बनायी। मीठी बहुत ही पराक्रमी शासक थे।जिससे सभी शासकों की उपाधि जनक हो गयी। मिथिला को भी जनक पुरी कहते हैं। महाराज निमि नेपाल के शासक थे। इसी से नेपाल को पहले "निमिपाल" कहते थे,कालान्तर में नेपाल। इसी वंश में शाक्यसिंह पैदा हुए थे…जिनकी नैतिकता एवं लोकोपकार के कारण उन्हें शाक्य मुनि कहते है। इनके नाम से इस वंश को शाक्य वंश कहा जाने लगा। इसकी राजधानी कपिलवस्तु थी। इसी वंश में आगे चलकर राजा शुद्धधन पैदा हुए थे।जिनके पुत्र भगवान बुद्ध थे। इनका बचपन का नाम सिद्धार्थ था। जन्म के बाद इनकी मां स्वर्ग सिधार गयीं । इनका पालन पोषण इनकी सौतेली माता गौतमी जी ने किया था। इसी से इनका एक नाम गौतमी भी था। बाद में ये और इनके अनुयायियों ने बौद्ध धर्म का प्रचार दर्जेनों देशों में किया।
निमि वंशीय शासकों की सूची निम्नलिखित है:::=
सुर्य वंश
1)मनु
2)इक्ष्वाकु
3)निमि
4)मिथि(जनक)
5)उदावसु
6)नन्दिवर्धन
7)सुकेतु
8)देवरात
9)वृहदुक्य
10)महावीर्य
11)धतिमान
12)सुधृति
13)धृष्टकेतु
14)हर्यश्व
15)मरु
16)प्रतिन्धक
17)कृतिरथ
18)देवमीढ़
19)विवुध
20)महाधृति
21)कृतिराज
22)महारोमा
23)स्वर्णरोमा
24)हस्वरोमा
25)सीरध्वज
26)भानुमान
27)शतद्यम्न
28)सूची
29)उर्जवह
30)शतध्वज
31)शकुनि
32)अंजन
33)कुरुजित
34)अरिष्टनेमि
35)श्रुतायु
36)सुपार्श्व
37)संजय
38)क्षेमधि
39)अनेना
40)सत्यरथ
41)उपगुरु
42)उपगुप्त
43)स्वागत
44)स्वानन्द
45)सुवर्चा
46)सुभाषण
47)श्रुत
48)सुश्रुत
49)जय
50)विजलय
51)ऋत
52)मुनय
53)वातहव्य
54)धृति
55)बहुलश्न
56)कृति
मनु की पचिसवी पीड़ी में सीरध्वज नामक राजा हुए। मीठी के सारे वंशज जनक कहलाते हैं ।इसलिए सीरध्वज को भी जनक कहते है। इनकी दो पुत्रीयां थी --सीता और उर्मिला । सीता जी की विवाह भगवान रामचन्द्र जी से और उर्मिला का विवाह लक्षणजी से हुआ था। उनके भाई का नाम कुशध्वज ;उनकी दो पुत्रीयां थी--माण्डवी और श्रुति कीर्ति, ।उनकी शादियाँ क्रमशः भरत और शत्रुध्नजी से हुई थी। इस वंश के क्षत्रिय अब बिहार प्रान्त के उत्तरांचल (मिथिला ञ्चल) में बसते है।
: निमि वंश के दो शाखाएं
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1…निमुड़ी=
गोत्र=काश्यप
प्रवर=काश्यप,वत्सार,नध्रुव
कुलदेवी=प्रभावती
वेद=यर्जुर्वेद
शाखा=माध्यन्दिनीय
सूत्र=पारस्कर गृझ सूत्र
नदी=कोसी
महाराज निमि के ज्येष्ठ पुत्र मीठी वंशज तो निमिवंशीय कहलाते हैं और उनका छेटे भाई के वंशज निमुड़ी कहलाते है।उन दोनों वंशों के गोत्र ,प्रवर,वेद आदि समान है।
2)निशान शाखा
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गोत्र=वत्स
प्रवर=और्व्य,च्यवन,भार्गव,जामदग्न्य,अप्तुवान
वेद=सामवेद
शाखा=कौथुमी
सूत्र=गोभिल गृझ सूत्र
कुलदेवी=भगवती
इस वंश के लोग बिहार के मजफ्फरपुर ,पटना,गया, तथा शाहाबाद जिलों में मिलते है।।
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