चंद्रवंशी_क्षत्रिय_रवानी_कुल_के_राजपूतो_का_इतिहास

.     ●#चंद्रवंशी_क्षत्रिय_रवानी_कुल_के_राजपूतो_का_इतिहास●

वंश - #चंद्रवंश

कुल - #रवानी (पुरुवंशी,भरतवंशी,   कुरूवंशी,         #बृहद्रथवंशी)

कुलदेवी - बंदी (जरा) माता

कुलदेवी स्थान - #राजगीर

कुल देवता- #सिद्धेश्वर महादेव

गोत्र - अत्रि, #भारद्वाज

प्रमुख गद्दी - राजगीर

गढ़ व स्टेट - उमगा स्टेट, #रवाणगढ़, बांधवगढ़ (1 वर्ष), चुनारगढ़ (543 ई.पु), कुमाऊं

वेद - यजुर्वेद

उप वेद - धनुर्वेद

शाखा - मध्यान्दनीय 

सूत्र - कात्यायन (गृह)

वर्ण - #क्षत्रिय 

जाति - #राजपूत

               ★#रवानी_कुल_का_इतिहास★

#रवानी_कुल_के_क्षत्रिय_राजपूतों ने 2800 वर्ष वैदक काल से लेकर कलियुग तक #मगध पर शासन किया। 

रवानी कुल मगध (बिहार) को स्थापित एवं शासन करने वाला प्रथम एवं प्राचीनतम क्षत्रिय राजवंश है। रवानी (कुल) वंश #बृहद्रथ_वंश का ही परिवर्तित नाम है। 

रवानी कुल की उत्पत्ति #चंद्रवंशी_क्षत्रिय_वंश से है, व इनकी वंश श्रंखला पुरुकुल की है। सबसे पहले यह कुल #पुरुवंश कहलाया, फिर #भरतवंश, फिर #कुरुवंश, फिर बृहद्रथवंश कालांतर में इसी वंश को रवानी क्षत्रिय बोला जाता है। परंतु यह वही प्राचीन कुल #पुरुकुल है, जो #चंद्रवंशी_राजा_पूरू से चला एवं प्रथम कुल कहलाया। 

#रिपुंजय (543 ई.पु) रवानी कुल के मगध पर शासन करने वाले अंतिम महाराजा थे।

इस वंश के नामकरण की मान्यता यह है कि मगध की जब मगध की सत्ता पलटी एवं 344 ई. पु ने शुद्र शासक महापद्म नंद मगध की गद्दी पर बैठा; फिर उसके बाद जब उसका पुत्र #धनानंद गद्दी पर आसीन हुआ तब वह मगध की प्रजा पर अत्याचार करने लगा तथा अपनी शक्ति का दुरूपयोग करने लगा।
यह सब देख इन क्षत्रियों को यह अपने पूर्वजों द्वारा बसाई एवं सदियों शासित पवित्र भूमि का आपमान समझा एवं प्रतिशोध लेने की ठान ली। इसका अवसर इन्हे चंद्रगुप्त द्वारा नंद पर युद्ध के प्रयोजन में मिला। इन क्षत्रियों ने चंद्रगुप्त का साथ नंद के खिलाफ युद्ध में दिया एवं वीरता के साथ लड़े परन्तु नंद की विशाल सेना होने के कारण चंद्रगुप्त युद्ध हार गया एवं पंजाब चला गया तथा नंद मगध के क्षत्रियों पर अत्याचार करने लगा। विशेषकर इन चंद्रवंशी (जरासंध वंशी) क्षत्रियों पर अत्याचार होने के कारण यह #क्षत्रिय #पाटलिपुत्र से बाहर निकल कर अपनी पूर्वजों की भूमि पर रमण करने लगे जिस कारण यह अपने आपको रमण क्षत्रिय कह कर पुकारने लगे। रमण शब्द का अपभ्रंश ही रवानी हुआ।
रवानी का अर्थ होता है:
#प्रवाह__तीक्ष्णता__धार__तेज__बीना__रुकावट__चलने__वाला। इस कारण इन्होने यह रवानी शब्द अपने लिए उपयुक्त समझा एवं #रवानी_क्षत्रिय कहलाए। 
शासन स्थापित करने एवं निवास क्षेत्र में अपना मजबूत अस्तित्व रखने के कारण #रवानी_राजपूतों को उनका विरुद #रमण_खड्ग_खंडार प्राप्त हुआ; जिसका अर्थ होता है: मूल स्थान छोड़ कर रवाना हुए अलग-अलग स्थानों पर खंडित हुए एवं जहां-जहां खंडित हुए खड्ग (तलवार) के दम पर वही शासन स्थापित किया एवं अपनी तलवार के दम पर अपना अस्तित्व कायम रखा। 

तत्पश्चात, पांचवी या छठी शातबदी तक जाति व्यवस्था ढलने के कारण #रवानी कुल के #राजपूत कहलाए जाने लगे। 

अतः 328 ई.पु से मगध के क्षत्रिय राजवंश #बृहद्रथवंश_का_परिवर्तित_नाम__रवानीवंश हुआ तथा यह रवानी क्षत्रिय राजपूत कहलाए। इस वंश की 30 से अधिक शाखाएं बिहार में निवास करती है। कुंवर सिंह के सेनापति मैकू सिंह भी रवानी वंश की आरण्य शाखा के राजपूत थे।

गढ़वाल के शक्तिशाली 52 गढ़ो में एक रवानी राजपूतो का गढ़ रवाणगढ़ भी है।

       ⚔️ चंदेल (रवानी) की उत्पत्ति व इतिहास⚔️

 वंश परिचय: रवानी क्षत्रिय नंद के अत्याचारों से बचते हुए मगध से दक्षिण की ओर चेदी यानी आज के बुंदेलखंड में आकर बसे जहाँ एक समय उनके पूर्वज एवं जरासंध महाराज के दादाश्री #श्री_चेदी_राज_उपरीचरवसु का शासन था 
एवं #सम्राट_जरासंध के शासनकाल में #शिशुपाल ने भी जरासंध जी के नेतृत्व में चेदी की बागडोर सम्भाली थी। चंदेल अपना गोत्र #चंद्रायन बतलाते हैं, जो किसी ऋषि से सम्बंध नहीं रखता। चंद्रायन मे दो शब्दों की संधि है चंद्रवंशी एवं पलायन यह दो शब्द जुट कर चंद्रायन बनाते हैं जो एक याददाश्त के तौर पर यह गोत्र अपनाया गया था। आज भी चंदेलों को चंद्रवंशी न लिखकर उपशाखा के रूप में चंद्रवंशी वंश लिखा जाता है, क्योंकि रवानीयों को आज भी कही-कही चंद्रवंशी ही पुकारा जाता है एवं लिखा जाता है। जिस प्रकार 36 कुल मे रवानी न लिख कर चंद्रवंशी लिखा गया है। आज भी जीन चंदेलों को अपना मूल गोत्र #भारद्वाज याद है वे अपना गोत्र भारद्वाज ही बतलाते हैं। एवं कई #चंदेल तो अपनी #प्राचीन_कुलदेवी_जरा_माता का ही पूजन करते हैं। काशी नगरी के विद्वान लेखक श्री गोपीनाथ सिंह जी ने अपनी पुस्तक "रवानी अर्थात #पतित_चंदेल" में इसका अच्छा वर्णन किया है।

 इतिहास: अत्याचारों से बचते हुए बुंदेलखंड में बसे रवानी क्षत्रियों मे एक रवानी क्षत्रिय न्ननुक (चंद्रर्वमन) ने सामंत के रूप मे प्रतिहारों के यहां काम किया एवं प्रतिहारों का शासन कमज़ोर पड़ने पर स्वयं स्वतंत्र शासन 8 वीं शताब्दी में घोषित किया एवं चंदेल वंश की स्थापना की। चन्देल वंश भारत का प्रसिद्ध राजवंश हुआ जिसने 08वीं से 12वीं शताब्दी तक स्वतंत्र रूप से यमुना और नर्मदा के बीच बुंदेलखंड तथा उत्तर प्रदेश के दक्षिणी-पश्चिमी भाग पर राज किया। चंदेल वंश के शासकों का बुंदेलखंड के इतिहास में विशेष योगदान रहा है। उन्‍होंने लगभग चार शताब्दियों तक बुंदेलखंड पर शासन किया। चन्देल शासक न केवल महान विजेता तथा सफल शासक थे अपितु कला के प्रसार तथा संरक्षण में भी उनका महत्‍वपूर्ण योगदान रहा। चंदेलों का शासनकाल आमतौर पर बुंदेलखंड के शांति और समृद्धि के काल के रूप में याद किया जाता है। चंदेलकालीन स्‍थापत्‍य कला ने समूचे विश्‍व को प्रभावित किया उस दौरान वास्तुकला तथा मूर्तिकला अपने उत्‍कर्ष पर थी। इसका सबसे बड़ा उदाहरण हैं खजुराहो के मंदिर जो आज भी मौजूद हैं।

चंदेल शासन परंपरागत आदर्शों पर आधारित था। यशोवर्मन् के समय तक चंदेल नरेश अपने लिये किसी विशेष उपाधि का प्रयोग नहीं करते थे। धंग ने सर्वप्रथम परमभट्टारक महाराजाधिराज परमेश्वर परममाहेश्वर कालंजराधिपति का विरुद धारण किया। कलचुरि नरेशों के अनुकरण पर परममाहेश्वर श्रीमद्वामदेवपादानुध्यात तथा त्रिकलिंगाधिपति और गाहड़वालों के अनुकरण पर #परमभट्टारक इत्यादि समस्त राजावली विराजमान विविधविद्याविचारवाचस्पति और कान्यकुब्जाधिपति का प्रयोग मिलता है।

पतन: 1203 ई. में कुतुबुद्दीन ऐबक ने परार्माददेव को पराजित कर कालिंजर पर अधिकार कर लिया और अंततः 1305 ई. में चन्देल राज्य दिल्ली में मिल गया।

रवानी राजपूत राज वंशावली

1.ब्रह्म

2.अत्रि

3.चंद्र

4.बुद्ध

5.पुरुरवा

6.आयु

7.नहुष

8.ययाति

9.पुरु (पुरुवंश के संस्थापक)

10.जनमेजय

11.प्राचीन्वान

12.संयाति

13.अहंयाति

14.सार्वभौम

15.जयत्सेन

16.अवाचीन

17.अरिह

18.महाभौम

19.अयुतनायी

20.अक्रोधन

21.देवातिथी

22.अरिह

23.ऋक्ष

24.मतिनार

25.तंसु

26.ईलिन

27.दुष्यंत

28.भरत (भरतवंश तथा भारतवर्ष के संस्थापक)

29.भुमन्यु

30.सुहोत्र

31.हस्ती (हस्तिनापुर के संस्थापक)

32.विकुण्ठन

33.अजमीढ़

34.ऋक्ष

35.संवरण

36.कुरु (कुरुवंश तथा कुरुक्षेत्र के संस्थापक)

37.सुधनु

38.सुहोत्र

39.च्यवन

40.कृतक

41.उपरीचर वसु

42.बृहद्रथ (बृहद्रथ वंश तथा मगध के संस्थापक)

43.जरासंध

44.सहदेव

45.सोमापी

46.श्रुतश्रवा

47.आयुतायु

48.निरामित्र

49.सुनेत्र

50.वृहत्कर्मा

51.सेनजीत

52.श्रुतंजय

53.विपत्र

54.मुचि सुचि

55.क्षमय

56.सुवत

57.धर्म

58.सुश्रवा

59.दृढ़सेन

60.सुमित

61.सुबल

62.सुनीत

63.सत्यजीत

64.विश्वजीत

65.रिपुंजय (मगध के अंतिम शासक) 543 ई.पु

66.समरंजय

रिपुंजय के बाद चंंदेल वंश वंशावली

रिपुंजय 543 ई.पु

 । 

नन्नुक (831 - 845 ई.) (संस्थापक)

वाक्पति (845 - 870 ई.)

जयशक्ति चन्देल और विजयशक्ति चन्देल (870 - 900 ई.)

हर्ष चन्देल (900 - 925 ई.)

यशोवर्मन (925 - 950 ई.)

धंगदेव (950 - 1003 ई.)

गंडदेव (1003 - 1017 ई.)

विद्याधर (1017 - 1029 ई.)

विजयपाल (1030 - 1045 ई.)

देववर्मन (1050-1060 ई.)

कीरतवर्मन या कीर्तिवर्मन (1060-1100 ई.)

सल्लक्षणवर्मन (1100 - 1115 ई.)

जयवर्मन (1115 - 1120)

पृथ्वीवर्मन (1120 - 1129 ई.)

मदनवर्मन (1129 - 1162 ई.)

यशोवर्मन द्वितीय (1165 - 1166 ई.)

परमार्दिदेव अथवा परमल (1166 - 1203 ई.)

🙏🏻जय मां भवानी।🙏🏻

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