महर्षि श्री अत्रि ऋषि जी के वंश में
महर्षि श्री अत्रि ऋषि जी के वंश में
अत्रि
औद्दालक
कृष्णात्रेय ( दुर्वासा)
4.श्वेतात्री
कौशिक ( अत्रि)
6.चंदात्रेय
इस तरह अत्रि वंश में 6 गोत्र हैं
इसमें….
अत्रि
औद्दालक
कृष्णात्रेय ( दुर्वासा)
4.श्वेतात्री
कौशिक ( अत्रि)
अत्रि वंश के इन 5 (पांच) गोत्र के त्रिप्रवर (तीन प्रवर) थे
तीन प्रवर ऋषि के नाम
1.आत्रेय
2.आर्यानानस
3.शावश्व
यह तीन प्रवर ऋषि थे
कृष्णात्रेय (दुर्वासा) गोत्र का परिचय विवरण
कृष्णात्रेय (रोड़वाल)
गोत्र : कृष्णात्रेय ,
अटक : दवे , जोशी
वेद : यजुर्वेद
शाखा : माध्यन्दिन शाखा
प्रवर : 03 – त्रिप्रवर (तीन प्रवर)
कृष्णात्रेय गोत्र के तीन प्रवर के नाम
1.आत्रेय
2.आर्यानानस
3.शावश्व
कुलदेवी : श्री अन्नपूर्णा माताजी(श्री पीपलसा माता)
कुल माता: श्री सती अनसूया माता (अत्रि ऋषि पत्नी)
गणेशजी : बहुरूप- विघ्नहरराज
इष्टदेव महादेव: विश्वेश्वर (काशी) ,राजनाथ राजेश्वर (रोहिडा)
इष्ट देवता : अत्रि-अनसूया अंश त्रिगुणातीत श्री दत्तात्रेय भगवान
भैरव: असितांग भैरव /भीषण भैरव
मूल स्थान क्षेत्र: चित्रकूट – काशी( वाराणसी)- सिद्धपुर – डालवाणु – पिपलसा- रोहिडा (रोहितपुर)
सिद्धपुर (श्रीस्थल ) के महाराजा
श्री मुलदेव राज सोलंकी ने जब ब्राह्मणों 21 पद अर्पित किए थे उसमे कृष्णात्रेय गोत्र के ब्राह्मण को भी पद अर्पित किया था
और
सरस्वती नदी के तट विस्तर का डालवाणु गाँव ( वडगाम तहसील) भी दान दिया था
डालवाणु गाँव में आज भी कृष्णात्रेय गोत्रीय कुलदेवी श्री अन्नपूर्णा माताजी का मंदिर हैं
कृष्णात्रेय गोत्र के ब्राह्मण यजुर्वेद के स्वाध्यायी वेदोक्त, दैवज्ञ, कर्मकांड, ज्योतिष शास्त्र एवं कृषि के क्षेत्र में विद्वान थे
“कृष्णात्रेय” – दुर्वासा ऋषि का नाम हैं
महर्षि अत्रि ऋषि जी के महान तपस्वी विद्वानपुत्र महर्षि दुर्वासा ऋषि जो कृष्णात्रेय नामसे भी जाने जाते थे
ब्राह्मणों में उदीच्य एवं प्राच्य दो विभाग थे
देश के उत्तर भाग
हिमालय क्षेत्र ,हिमालय के तलहटी क्षेत्र , चित्रकूट, काशी क्षेत्र, प्रयाग, सिंधु व गंगा के तटीय एवम मैदान क्षेत्र के ब्राह्मणो को “उदीच्य” कहे जाते थे
सरस्वती नदी के उत्तर भाग में बसने वाले “प्राच्य” ब्राह्मण कहे जाते हैं
सिद्धपुर क्षेत्र के महाराजा मुलदेव राज सोलंकी के निमंत्रण से उत्तर भारत से सहस्त्र ब्राह्मण सिद्धपुर आये थे इसलिए उन सहस्त्र ब्राह्मणों को औदीच्य सहस्त्र ब्राह्मण कहलाये
उन सहस्त्र ब्राह्मणों में “कृष्णात्रेय गोत्र” के ब्राह्मण भी शामिल थे
और..
सिद्धपुर क्षेत्रमें पधारे हुए औदीच्य सहस्त्र ब्राह्मणो ने हररोज 1 हजार सहस्त्र पार्थिव लिंग की पूजा का अनुष्ठान करना सिध्दपुर क्षेत्र में शरू किया था
।। जय गोविंद माधव ।।
जयति जय जय महा सती कुलमाता श्री अनसूया माता
जय श्री अन्नपूर्णा माता जी
।। जय विश्वेश्वर महादेव ।।
।। ॐ द्रां दत्तात्रेयाय नमः ।।
जय श्री दुर्वासा ऋषिराज
उत्तरभारत के तीर्थ क्षेत्र से आमंत्रित किये ब्राह्मणों की विगत
105 – ब्राह्मण- गंगा- यमुना के संगम प्रयाग तीर्थ क्षेत्र से
100- ब्राह्मण – श्री च्यवन ऋषि के पवित्र आश्रम से
100- ब्राह्मण – सरयू नदी के तटीय क्षेत्रों से वेदशास्त्रज्ञ सामवेदी
200 – ब्राह्मण – कान्यकुब्ज क्षेत्र से अर्थात कन्नौज क्षेत्र के यजुर्वेदी
100- ब्राह्मण – काशी क्षेत्र के यजुर्वेदी
100- ब्राह्मण – कुरूक्षेत्र के यजुर्वेदी
100- ब्राह्मण – गंगाद्वार ( हरिद्वार क्षेत्र) के ऋग्वेदी
100- ब्राह्मण- नैमिषारण्य क्षेत्र के ऋग्वेदी
132- ब्राह्मण – पुष्करराज क्षेत्र के ऋग्वेदी
कुल 1037- ब्राह्मण सिद्धपुर क्षेत्र के महाराजा श्री मुलदेव राज के द्वारा आमंत्रित किये थे
सिद्धपुर श्रीस्थल क्षेत्र में पधारे
1037 – ब्राह्मणों का
।। जय गोविंद माधव ।।
जयघोष था
सब ब्राह्मण “जय गोविंद माधव” पुकारते थे
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