लक्ष्मणगढ़ सीकर के शेखावत राजपूतो का इतिहास

●लक्ष्मणगढ़ सीकर के शेखावत राजपूतो का इतिहास●
●आमेर का इतिहास●

कच्छवाह या कुशवाह राजपूत सूर्यवंशी क्षत्रियो की प्रमुख खाप है। परमात्मा विष्णु से यह वंश चला है, इसी वंश में महाराज वैश्वस्त मनु का जन्म हुआ था । महाराज मनु के पुत्र इक्ष्वाकु नाम के विश्वप्रसिद्ध प्रतापी राजा हुए, जिससे इस वंश का नाम इक्ष्वाकु वंश पड़ा ... इसी इक्ष्वाकुवंश में #भगवान_राम का जन्म हुआ, भगवान राम के दो पुत्र है ... ज्येष्ठ पुत्र का नाम कुश है, एवं छोटे पुत्र का नाम लव ।। 
कर्नल टॉड ने कच्छवाहो के इतिहास में बहुत बड़ी भूल है ... कर्नल टॉड ने लिखा है .. 
The Kacchwah or kachhwa race claims desent form kush the Second son of Rama , King Of Koshula . (  Annaals and antiques of rajsthan Vol II P.333 ) 
जबकि इसके उलट वाल्मीकि रामायण एवं विष्णुपुराण जैसे प्रामाणिक वैदिक पोथियों में स्पष्ठ लिख्ता है, की भगवान राम के ज्येष्ठपुत्र का नाम " कुश " था । 

भगवन् रामपत्नी सा प्रसूता दारकद्वयम् । 
ततो रक्षां महातेजः कुरु भूतविनाशिनीम् ॥
तेषां तद् वचनं श्रुत्वा महर्षिः समुपागमत् । बालचन्द्रप्रतीकाशी देवपुत्रौ महौजसौ ॥

भगवन् ! श्रीरामचन्द्रजीकी धर्मपत्नीने दो पुत्रोंको जन्म दिया है । अतः महातेजस्वी महर्षे ! आप उनकी बालग्रहजनित बाधा निवृत्त करनेवाली रक्षा करें ॥उन कुमारोंकी वह बात सुनकर महर्षि उस स्थानपर गये । सीताके वे दोनों पुत्र बालचन्द्रमाके समान थे ....
( श्रीमदवाल्मीकिरामायणे -उत्तरकांडे षट्ष्ष्टितमः सर्गः पृष्ठ संख्या - ८४१ ) 
( देवी सीता के दो पुत्रों का जन्म कथा श्लोक ३ एवं ४ ) गीताप्रेस गौरखपुर संवत २०७५ का तिरपनवार्मुद्रण ) 76 Valmiki Ramayan Section ) 

आगे वर्णन है...
कुशमुष्टिमुपादाय लवं चैव तु स द्विजः।
वाल्मीकिः प्रददौ ताभ्यां रक्षां भूतविनाशिनीम् ॥
यस्तयोः पूर्वजो जातः स कुशैर्मन्त्रसत्कृतैः । निर्मार्जनीयस्तु तदा कुश इत्यस्य नाम तत् ॥
यश्चावरो भवेत् ताभ्यां लवेन सुसमाहितः ।
निर्मार्जनीयो वृद्धाभिलवेति च स नामतः।।

ब्रह्मर्षि वाल्मीकि ने एक कुशाओं का मुट्ठा और उनके लव लेकर उनके द्वारा दोनों बालकों की भूत बाधा का निवारण करने के लिये रक्षा - विधि का उपदेश दिया   ' वृद्धा स्त्रियों को चाहिये कि इन दोनों बालकों में जो पहले उत्पन्न हुआ है , उसका मन्त्रोंद्वारा संस्कार किये हुए इन कुशों से मार्जन करें । ऐसा करनेपर उस बालक का नाम' कुश' होगा और उनमें जो छोटा है , उसका लव से मार्जन करें ।इससे उसका नाम ' लव ' होगा । ७-८ ॥

श्रीविष्णुपुराण के अनुसार भी महाराज कुश ही भगवान राम के ज्येष्ठ पुत्र थे ।। 

विष्णुपुराण के अध्याय 4 में श्लोक संख्या 104 -105 में स्पष्ठ वर्णन है, की भगवान श्रीराम के ज्येष्ठ पुत्र कुश थे 
अतिदुष्टसंहारिणो रामस्य कुशलवौ झै पुत्रौ लक्ष्मणस्याङ्गदचन्द्रकेतू तक्षपुष्कलो भरतस्य सुबाहुशूरसेनौ शत्रुघ्नस्य ।।१०४॥

यहां चारो भाइयों के वंश का वर्णन दिया गया है । जहां रामजी के पुत्रों का नाम आया है, वहां वय अनुसार " कुश-लव " लिखा गया है । लव-कुश नही । अगर लव ज्येष्ठ होते, तो उनका नाम पहले होता, यह तो हुई , एक बात -- ओर रामायण से हमारा यह भरम भी दूर होना चाहिए, जिसमे भगवान कुश को घास के पैदा होना बताया गया है ...

 शेखावत के पूर्वजो का अयोध्याजी से  लक्ष्मणगढ (सीकर) में आना कैसे हुआ, इसकी जानकारी भी आपको उपलब्ध करवाते है ....

महाराज कुश की संतान कच्छवाह क्षत्रिय है, जिसका मुख्य ठिकाना वर्तमान में " आमेर " है । भारत के प्रत्येक क्षेत्र में कुशवाह क्षत्रिय् आपको बहुल मात्रा में मिल जाएंगे । चाहे मध्यप्रदेश हो, या उत्तरप्रदेश , या बृज MP या राजस्थान, कश्मीर, बिहार । यहां तक कि गुजरात मे भी काफी कच्छवाहे रहते है ।।
कच्छवाह शब्द का उल्लेख राजस्थानी साहित्य में 13वीं सदी में ही आ गया था । जैसा कि वीसलदेव रासो में लिखा है :-

"गोड़ चढ़या गज केशरी , 
कच्छवाह कहू निरवाण
कोई सोलंकी सांखला, 
कोई चावड़ा कोई चहुआन ।।"
कच्छवाहो के लिए कूर्म भी आया है ... जैसा कि कायम खान रासो में हमे मिलता है
 "कूर्म धूल मिलाई है " ( कायम खान रासो पेज 65 / 767) - क्यो की कायनखनियो के साम्राज्य को कच्छवाहो ने मिट्टी में मिला दिया .."

शोध से मालूम चलता है, की अयोध्याजी के अंतिम राजा सुमित्र के दो पुत्र #विश्वजीत_एवं_कूर्म थे ।
उन्ही के कारण उन्हें कूर्म कहा गया । अब प्रश्न यह रह जाता है की उन्हें #कच्छवाह क्यो कहा गया ?? 
इसका जवाब है, जैसे विक्रमादित्य ने शको का नाश किया, एवं शकारि कहलाएं, ( शक+अरि ) अर्थात शको को परास्त करने वाले ....

ठीक उसी तरह कच्छवाहो ने कच्छप जाति को परास्त किया, ओर कच्छपपरि/ कच्छपघात / कच्छवाह कहलाएं । कच्छप नागवंश की एक शाखा थी, जिसका वर्णन महाभारत के आदिपर्व में भी आता है .. 
कर्कोटटका सर्पश्च वासुकिश्च भुजंगम। 
कच्छपश्चाथ कुण्डश्च तक्षकश्च महोरगः ।।
( महाभारत आदि पर्व श्लोक 71 ) 

अधिकतर इतिहासकार इस बात पर सहमत है की 1023 से 1065 के बीच कच्छवाहे नरवर ( MP ) से दौसा ( राजस्थान ) आएं । दुल्हराय जी ने दौसा विजय किया था।  दौसा जाति पर विजय प्राप्त करने के बाद दुल्हैराय जी ने ढूंढाड़ की ओर कदम बढ़ाएं ... उन्होंने पहले भांडारेज जीता, मांची के मीणा शासको में आपसी क्लेश एवं ग्रहयुद्ध सा माहौल था, लेकिन दुल्हेराय जी के आक्रमण की खबर सुनकर ग्रहयुद्ध कुछ शांत हुआ, एवं मीणा शासक भी एक होकर रणभूमि में आ खड़े हुए ...

दुल्हेराय जी की सेना आगे बढ़ी लेकिन मीणाओ के आगे ढेर हो गयी ... मीणा गर्व का विजय लेकर वापस लौट गए, दुल्हेराय जी स्वयं भी रणभूमि में प्यासे अंतिम सांसे गिन रहे थे... उस समय माता बुढ़वाय जो कि कच्छवाहो की कुलदेवी थी, उन्होंने दुल्हेराय जी को दर्शन दिए, ओर कहा " सो क्यो रहे हो पुत्र, उठो लड़ो, देखो में तुम्हारे साथ हूँ ... बस विजय के बाद मेरा यह बुढ़वाय नाम बदलकर जमवाय कर देना ... 

माता का आशीर्वाद पाकर दुल्हेराय जी ने मीणाओ पर पुनः चढ़ाई की, ओर जीत गए । जहां माता में दुल्हेराय जी को पहाड़ के नाके पर दर्शन दिए, वहीँ एक जमवाय माता का मंदिर बनाया गया, ओर उस स्थान का नाम जमवा रामगढ़ रखा गया ...इसी जमवा रामगढ़ को दुल्हेराय जी ने अपनी राजधानी भी बनाया ...

तत्पश्चात दुल्हेरायजी बड़गुजरो पर आक्रमण किया, खोह के चांदु मीणाओ के साथ भी उनका झगड़ा हुआ, चांदु मीणा मारा गया, उसके बाद दुल्हेराय जी ने गेटोर जीता, उसके बाद दुल्हेराय जी को मालूम हुआ की ग्वालियर पर आक्रमण हुआ है, वह ग्वालियर गए, एवं वीरगति को प्राप्त हो गए ...

दुल्हेराय जी के बाद कांकिल गद्दी पर बैठे, मीणाओ ने कांकिल को कमजोर शासक समझकर संगठित होना शुरू किया, मीणाओ के संघर्ष अब आवश्यक था, मीणो की शक्ति भी अधिक थी । मीणा इस युद्ध मे जीत भी गए, लेकिन जमवाय माता पुनः सहायता को आ गयी, तब कांकिल जी ने आमेर के पास मीणाओ पर चढ़ाई की, ओर बड़ी बुरी तरह परास्त किया ... कांकिलजी ने उसके बाद अम्बिकेश्वर महादेव मंदिर बनवाया ..कांकिल जी ने यदुवंशियों से बैराठ के पास का क्षेत्र मेड़ भी जीता ।। कांकिल जी के पुत्र हनुदेव जी हुए, जो मीणाओ के साथ युद्ध मे वीरगति को प्राप्त हुए ...हनुदेव जी के पुत्र जान्हड़देव जी ने मीणाओ को पुनः परास्त कर दिया ....

जान्हड़देव के बाद उनके पुत्र पजबनदेव जी आमेर की गद्दी पर विराजमान हुए, यह अपने समय के सर्वश्रेष्ठ योद्धा थे । महाराज पृथ्वीराज चौहानों ने सबसे बड़े एवं विश्वसनीय सामन्त यही थे । मूहम्मद गौरी को बार बार पराजित करने में पजबन देव जी का बहुत बड़ा योगदान था, पृथ्वीराज- आल्हा-उदल -जयचंद के युद्ध मे पजबनदेव जी वीरगति को प्राप्त हुए, ओर महाराज पृथ्वीराज को सुरक्षित दिल्ली/अजमेर पहुंचाया ...पजबनजी के पुत्र मलयसिंह हुए, इनका कुतुबुद्दिन एवं मीणाओ दोनो से संघर्ष हुआ ।

मलयसिंहः के विजलदेव हुए, उनके राजदेव जो कि 201 वें वंसज थे । उनके बाद कीळहण जी हुए, वीर विनोद के पृष्ठ संख्या 1270-72 के बीच पता चलता है, की आप महाराणा कुम्भा के सामन्त थे ।
किलहन जी के 2 रानी थी, इनमें एक चौहान थी, कहते है वह चौहान रानी रौजाना 100 टन अनाज दान करती थी । कच्छवाहो कि वंशावली में लिखा है " एक बार मारवाड़ ( नागौर से जैसलमेर) में बहुत अकाल पड़ा, तब वहां की अधिकतर प्रजा आमेर आ गयी, किलहन जी ने किसी को भूखा नही रहने दिया, सबके अनाज की व्यवस्था की ...

किल्हनजी के पुत्र कुंतलजी हुए ... इन्होंने कुन्तलगढ़ का निर्माण करवाया .. मेरठ में इनका अल्लाउद्दीन खिलजी से घोर युद्ध हुआ, ओर पराजित हुए, भारेख किले में कच्छवाह कूल की  राजकन्याओं एवं रानियों का जौहर हुआ । मौके का फायदा उठाते हुए धिवराज गोड़ ने एवं मीणाओ ने आमेर पर आक्रमण कर दिया,

उनके जुनसी हुए ... जुणसी  के उदयकर्ण जी, उदयकर्ण जी के महाराज बालाजी ... बालाजी के मोकल जी .. मोकल जी के काफी समय तक संतान नही हुई, तब उन्होंने वृंदावन की यात्रा कर गौसेवा की, तब उन्हें एक पुत्र की प्राप्ति हुई, इन्ही के पुत्र राव शेखाजी हुए ...

महाराव शेखाजी के वंसज ही " शेखावत " कहलाते है । 
शेखावतों के आदिपुरुष वैश्वस्त मनु है ... इसी वंश में भगवान राम एवं इसी वंश में शेखाजी का भी जन्म हुआ ...
शेखाजी का जन्म निर्वाण( चौहान) राणी से असौज सुदी 10 ( विजयादशमी )  को 24 सितंबर 1433 ) को हुआ था ... जिस समय शेखाजी का राज्याभिषेक हुआ, उस समय आपकी आयु मात्र 12 वर्ष थी ..
शेखाजी ने नागरचल परमारो से जीत लिया, उस समय आपकी आयु मात्र 16 वर्ष थी । शेखाजी से इस प्रकार पराजित होकर सांखलो ( परमारो ) ने नोपाजी ने नेतृत्व ने एकत्रित होकर शेखाजी को पराजित करने संगठित हुए ..

लेकिन 16 वर्ष के युवा के जवानी के तूफान के आगे वह कहां ठहरने वाले थे, घमासान रण हुआ, लेकिन शेखाजी ने इस संगठित शक्ति को भी परास्त कर दिया ।। सम्पूर्ण सांखला पर शेखाजी का अधिकार हो गया । 

उसके बाद उन्होंने टांक के यादवों पर धावा बोला, ओर उन्हें भी पराजित किया ।  इतनी विजयो के पश्चात शेखाजी की धाक अब दिल्ली एवं मेवाड़ तक जम चुकी थी ...

शेखाजी को नाण जैसा छोटा सा ठिकाना मिला था, उन्होंने एक छोटे से गांव को राज्य में बदल दिया ... अमरसर नाम से अपनी राजधानी बनाई ...
भाग्य जब साथ देता है, तो छप्पर फाड़ कर देता है .. शेखाजी की सेना को अब ओर भंयकर शसक्त बल मिलने वाला था, उनके नए सेंनिक बनने वाले थे पन्नी पठान ...

गुजरात के सुल्तान महमूद बेगड़ा से नाराज होकर कुछ पठान मुल्तान की ओर जा रहे थे । पांच सौ पठान अमरसर आकर रुके । शेखाजी ने मौका लपक लिया, ओर उन्हें कहा " आज से तुम मेरे भाई हो, हमारे वंश के बीच कभी कोई बैर नही रहेगा ... " 

पठानो को तोहफे में बारह गांव दिए गए, वह आज भी #बारहबस्ती नाम से जाने जाते है । यह बारहबस्ती क्षेत्र दिल्ली से 100 किलोमीटर दूर है ।  बुलंदशहर, गाजियाबाद, अमरोहा, गिरोहा,बागी, बुगरासी, जलालपुर, चण्डियाना, गेसुपुर, बरवाला, उमरपुर, शेरपुर , बहादुरगढ़, हसनपुर, बुकलाना, मोहम्मदपुर आदि क्षेत्र बारह बस्तियो में आते है ...
कुछ इतिहासकार इससे सहमत नही है, वह हस्तेड, भूतेदा आदि क्षेत्रों को बारहबस्ती मानते है ... 

पठान सेंनिक मिलते ही शेखाजी ने आमेर को " टैक्स " देना बंद कर दिया । इस पर आमेर के महाराज चंद्रसेन को क्रोध आया, की आप कर क्यो नही देते ? शेखाजी ने जवाब दिया " मैं गुलामी के इस प्रतीक को धोना चाहता हूं, चन्द्रसेनजी ने सेना भेज दी, राव शेखाजी ने नाण के पास चंद्रसेनजी का मुकाबला किया , शेखाजी ने अपनी सेना के तीन विभाग कर दिए, इस व्यूह के आगे आमेर की सेना टिक नही सकी, ओर आमेर के सेंनिक भाग खड़े हुए , यहां से राव शेखाजी ने कुक्स नदी तक के क्षेत्र पर अपना ध्वज फहरा दिया ...

आमेर का स्वयं का राज्य भी खतरे में पड़ गया, तब नरुजी की मध्यस्था में संधि हुई ..संधि में नियम थे ।।।

●आज से शेखाजी का आमेर को टैक्स देना बंद है 
● जो क्षेत्र शेखाजी ने जीत लिए, वह उन्हे ही दिए जाएं
●शेखाजी आमेर पर, ओर आमेर शेखाजी पर आक्रमण नही करेंगे । दोनो पक्षो में सहमति भी हो गयी ...

उसी एमी मेड़ता के राजा दूदाजी से गयासुद्दीन के पुत्र नासिरुद्दीन ने मेड़ता छीन लिया, दूदाजी अमरसर शेखाजी के पास आ गए, तथा आमेर से मित्रता की, की किसी तरह दूदाजी को मेड़ता दिलवाया जाएं । कच्छवाहो ने अब संगठित होकर तलवार उठा ली, भांडारेज स्थान पर सुल्तान गियासुदीन से युद्ध हुआ, ओर उसे कैद कर लिया गया ।

इसी के कुछ समय बाद अल्फ खान को पराजित किया । यह कायमखां का बेटा था । कायमखां चौहान थे, लेकिन फिरोजशाह तुगलक ने उन्हें परिवार समेत मुसलमान बनाया था । गोगाजी के यह वंसज थे । कायम खान के बेटे अल्फ खान पर " हिसार "  पर आक्रमण किया गया, अल्फ खान शेखाजी के हाथों मारा गया । यह सनातनधर्मियों की सबसे बड़ी विजयो में से एक थी ।। इस युद्ध मे 500 कच्छवाह सेंनिक भी वीरगति को प्राप्त हुए ...

उसके बाद शेखाजी ने तंवरो से युद्ध किया, एवं उनसे चरखीं, दादरी, भिवानी आदि प्रदेश जीत लिए । तंवर नोपसिंघ ने शेखाजी का मुकाबला किया, किंतु जल्द ही युद्धभूमि छोड़कर भाग गए ।

बहलोल खान लोदी का भी शेखाजी पर आक्रमण हुआ, शेखाजी के एक अन्य किले, शिखरगढ़ को घेर लिया गया , 18 दिनों तक घोर संग्राम हुआ, लोदी सेना भाग खड़ी हुई ....

शेखाजी अब तक भारत ही नही, बल्कि विश्वभर में अपनी धाक जमा चुके थे । दिल्ली सल्तनत के दाँत भी उन्होंने खट्टे कर दिए , जो उस समय अपराजित थी ।  शेखाजी की दिल्ली के सुल्तानों पर विजय ने हिंदुओ में एक नया जोश भर दिया, की तुर्क अफगान अपराजित नही है ...

शेखाजी के जीवन का अंतिम युद्ध #घाटवा_का_युद्ध था ... गोड़ शासक कोल्वराज जी ने अपने नगर के समीप तालाब खुदवाया । जो भी उनके नगर से गुजरता, उन्हें 4-4 टोकरी मिट्टी की बाहर लादनी आवश्यक थी ।  एक बार कच्छवाह राजपूत अपने ससुराल से अपनी पत्नी को लेकर जा रहा था, उसे भी यही करने पर विवश किया गया।  यह कार्य उसकी मर्यादा के अनुरूप नही था, लेकिन जनकल्याण का कार्य समझते हुए, 12 टोकरी उसने डाल दी, ओर कहा कि " मैने अपनी पत्नी के हिस्से की भी डाल दी है ।। एवं 4 हमारे तरफ से जनकल्याण हेतु श्रमदान ....

लेकिन गोड़ सेंनिक जिद पर अड़ गए, की तुम्हारी पत्नी को भी मिट्टी डालनी होगी, ओर बदतमीजी करने लगे । यह देखकर कच्छवाह राजपुत का खून खोल गया, एवं अपनी तलवार से एक गोड़ सेंनिक का सिर काट डाला ...शेष व्यक्ति में उस कच्छवाह राजपूत को मार डाला ।

क्षत्राणी शेखाजी के दरबार मे आयी, एवं अपने पति के दाह संस्कार की राख शेखाजी के चरणों मे रखकर बोली " महाराज एक वीर की पत्नी को, गोड़ राजा का शीश धड़ से अलग चाहिए..शेखाजी ने गोड़ राजा पर चढ़ाई की, एवं कोल्वराज का सिर काटकर अमरसर के द्वार पर लटका दिया । कोल्वराज के सैनिकों में सिर वापस लेने के लिए 12 बार आक्रमण किया, किंतु असफल रहें । उसके बाद गोड़ों के नए राजा रिड़मल जी ने शेखाजी को संदेश भेजा ...
गोड़ बुलावे घाटवा, चढ़ आओ शेखा
थारा लश्कर मारना, देखण अभलेखा
गोड़ राजा रिड़मल जी ने शेखाजी को बहुत घाव दिए, एवं उनके घोड़े को भी मार गिराया । शेखाजी के पुत्र मूलराज से लड़ते हुए वीरगति को प्राप्त हुए । अपने बेटे को मरते देखते ही शेखाजी का भी जीवन मरण का मोह छूट गया, ओर वह मूलराज पर टूट पड़े, सिर एक ही वार में धड़ से अलग कर दिया ....

पीछे रिड़मलजी अब होंशो हवास खो चुके थे । दोनो राजाओ ने अपनी अपनी संतान खो दी थी । शेखाजी के एक दूसरे पुत्र पूर्णमल जी भी वीरगति को प्राप्त हुए।  शेखाजी को स्वयं 16 घाव लगे, एवं वह भी वीरगति को प्राप्त हुए, लेकिन कच्छवाह सेनिको ने युद्ध जीत किया ....रायमल शेखाजी के उत्तराधिकारी हुए ....

अगर सीकर के इतिहास की बात करें, तो सीकर का इतिहास मुख्यतः श्रीदौलत सिंह जी के समय से शुरू होता है । दौलतसिंह जी वीरवर जसवंतसिंह के पुत्र थे।  दौलतसिंह जी के पिता अपने समय के शूरवीर थे, जिन्होंने ओरंगेजेब के सेनापति का सिर, उसके सामने ही ... केवल इस बात पर काट डाला, क्यो की उन्होंने किसी घोड़ी को " शेखावत " कह डाला ।। ओरंगजेब की हिम्मत नही हुई, की तत्काल जसवंत सिंह पर कारवाही कर सकें । 

इन्ही जसवंत सिंहः के पुत्र दौलतसिंह जी थे । दौलतसिंह जी ने ही सीकरी पर आक्रमण करके , उसे अपने वश में किया था, सीकर से लेकर खंडेला तक दौलतसिंह जी के वंशजो का राज था,  इस जमीन का पट्टा उन्होंने मोहनदास पुरोहित जी के नाम किया था । यह जमीन 501 बीघा थी । सीकर में पुरोहितों का इतिहास खंडेला से ही है, जो दौलतसिंहजी के समय खंडेला से सीकर आये थे । सीकर का इतिहास केवल इतना ही है, भारत के अन्य क्षेत्रों का इतिहास जितना गौरवशाली है, उतना ही गौरवशाली इतिहास, बल्कि उससे कहीं अधिक गौरवशाली इतिहास हमारे सीकर क्षेत्र का भी है ... 

फिलहाल सीकर के इतिहास की कुछ झलकियां आपके समक्ष प्रस्तुत करता हूँ ... विस्तार से वर्णन हम आगे किसी अन्य लेख में करेंगे ।।।

सीकर के ही कुंवर जसवंतसिंह ने ओरंगजेब के सेनापति का सिर काट डाला था । और ओरंगजेब कुछ नही कर सका । ओरंगजेब के सामने उस समय बड़े बड़े साम्राज्य घुटने टेक चुके थे ....

इसी पीढ़ी में आगे चलकर राव लक्ष्मणसिंहजी शेखावत हुए, जिन्होंने लक्ष्मणगढ सीकर बसाया था .... ओर आज वही हम सब का प्यारा क्षेत्र #लक्ष्मणगढ सीकर ही कहलाता है , जिसकी जड़े अयोध्याजी में है, भगवान राम के वंश का विशाल वटवृक्ष राजस्थान के सीकर जिले भी है ... उसी वंश की एक डाली 
हमारे सीकर एवं लक्ष्मणगढ सीकर के इतिहास की शेष चर्चा फिर कभी ....

इन पुस्तकों से प्राप्त जानकारी के आधार पर यह लेख तैयार हुआ है ।
●वाल्मीकि रामायण ●विष्णु पुराण ●ब्रह्मपुराण ● वायु पुराण ● महाभारत● बुद्ध पूर्व का भारत - मिश्रवन्धु ● कच्छवाहधार का इतिहास - रामसहाय ब्रह्मभट्ट लाहौरी ●  कच्छवाहो का समय - विरसिंहः तंवर ● वीर विनोद-श्यामलदास ● राजस्थान का इतिहास  VS Bhargav जी , रघुनाथसिंह काली पहाड़ी जी की पुस्तकें।
    
        🚩🙏🏻 जय जय मां भवानी।🙏🏻🚩
             🚩⚔️ जय जय राजपूताना।⚔️🚩

Comments

Popular posts from this blog

वशिष्ठ ऋषि और उनकी वंश परंपरा

चंद्रवंशी_क्षत्रिय_रवानी_कुल_के_राजपूतो_का_इतिहास

कैसे ज्ञात करें कि अपने वंश के कुलदेवता अथवा कुलदेवी कौन हैं