वासुदेव ऋषि
वासुदेव ऋषि:-
वासुदेव महर्षि रैवतक के शिष्य थे। जव इनके हृदय में जिगंसा की ज्वाला उठी तब ये घर,द्वार,कुटुम्व से नाता तोड़कर सदगुरु के अन्वेषन में निकल पड़े। इनका अन्तः कर्ण शुद्ध था।इनके मन में परमात्मा के साक्षात्कार के लिये सच्ची लगन थी ।भगवान् तो घट-घटवासी हैं ही। उन्होंने महर्षि रैवतक के अन्तस्तल में प्रेरणा कर ही दी।महर्षि इनके सामने अपने आपको प्रकट किया।इन्हें मन्त्र,साधना और सिद्ध का उपदेश करके भगवततत्व का साक्षात्कार करा दिया।इन्हें निरन्तर बोध रहने लगा कि मैं ब्रह्मा से अभिन्न हुँ।फिर ये बोध और अबोध से भी ऊपर उठ गये ।इनके लिये जगत् का अत्यन्ताभाव हो गया।।
सुतिक्षण ऋषि:-'मानस में सुतिक्षण की भक्ति परम आदर्श और सर्वाग्ड पूर्ण है।भक्ति की सभी दसाएँ इन्हें प्राप्त थी।प्रेम में इनकी ऐसी अवस्था वर्णन की गयी है जो परम योगीयों को भी दुर्लभ है। वाल्मीकी रामायण में सुतीक्षण जी एक ब्रह्मज्ञानी ऋषि है, किन्तु मानस में तो वे भक्ति की दसों दशाओं की प्राप्त कर एक सच्चे प्रेमी भक्त के रूप में हमे दिखाई देते है।ऐसी कथा है की ये महर्षि अगस्त्य जी के शिश्य थे।उनके पास पढ़ा करते थे। विद्याध्ययन समाप्त होने पर गुरु ने कहा-"अब तुम सब बिद्याओं को पढ़ गये अब तुम्हारा अध्ययन समाप्त हुआ।"अत्यन्त आग्रह देखकर गुरूजी ने कुछ खीझते हुए से कहा 'अच्छा'गुरुदक्षिणा देना ही चाहते है तो श्रीभगवान् सीता रामजी को लाकर हमें दर्शन करा दे।' सुतीक्षण जी गुरुके चरणों में प्रणाम करके चुपचाप चल दीये और जंगल में जाकर घोर तपस्या करने लगे। ये उन कौशल किशोर की वनवासी छवि का निरन्तर ध्यान करते रहते थे,उसी में मस्त रहते थे।बहुत दिनों के पश्चात् उन्होंने सुना कि कौशल्या नन्दवर्धन राजीवलोचन श्रीराम जगजन्नी सीता जी के सहित पधारे है और वे इधर हँसी रास्ते से आ रहे है।तब तो उनके हर्षका ठिकाना नहीँ रहा,वे प्रभुकी कृपालुता का बार -बार स्मरण करने लगें और भगवान प्रसन्न हुए।उन्हें सब सिद्धिया प्रदान कीं,अविरल भक्ति दी और सदा इसी रूप से उनके हृदय मन्दिर मे विराजे रहने का वरदान दिया ।सब प्रकार भक्तने उन्हें बाँध लिया ,तब पुछा --प्रभो !किधार जाना होगा।भगवान बोले " हम महामुनि भगवान् अगस्त्य के दर्शन को जा रहे है'। मुनि जल्दी से बोल उठे बहाँ तो मुझे भी चलना है।आप जा रहे हैं इसलिए नही,वे मेरे गुरु है।बहुत दिन से गया नहीं।अब मुझे जाना ही चाहिए,यही तो उनके चरणों में जाने का अवसर है'"।भगवान हँसे और उन्हें साथ ले लिया।अगस्त्य मुनि के आश्रम जाकर मर्यादापुरुषोतम भगवान तो महर्षि की आज्ञा की प्रतीक्षा में खड़े रहे,किन्तु सुतिक्षण को तो आज्ञा लेनी नहीँ थी।वे झटसे जाकर बोले--गुरुदेव! भगवान!वे आ गये,आ गये जिनकी आप प्रतीक्षा कर रहें थे।धन्य है वे गुरु जिनके सुतीक्षण जैसे परमभक्त शिश्य हैं जिन्होंने गुरु को साक्षात अखिल ब्रह्मांड के नायक प्रभु को ही लाकर समर्पित कर दिया।।
वाल्मीकि ऋषि:- भगवन्नाम के जप से मनुष्य क्या से क्या हो सकता है,इसका ज्वलन्त उदाहरण भगवान् वाल्मीकि है! इनका जन्म तो अंगिरा गोत्र के बाह्मन कुल में हुआ था,किन्तु डाकुओं के संसर्ग में रहकर ये लुट-मार हत्याएँ करने लगे। जो भी आता उसी को लूटते और कोई कुछ कहता तो उसे जान से मार देते। इस प्रकार बहुत बर्षोतक ये इस लोकनिन्दित क्रुर कर्म को करते रहे।नारद जी ने बड़े ही कोमल स्बर में हँसते-हँसते कहा 'हमारे पास और है ही क्या?यहाँ वीणा है,एक वस्त्र है;इसे लेना चाहो तो ले लो,जान क्यों मारते हो?" प्राणीयों के वध के समान कोई दूसरा कोई पाप नहीँ है।यह सुनकर वाल्मीकि जी ने कहा ---"भगवान्! मेरा परिवार बड़ा है,उनकी आजीविका का दूसरा कोई प्रबन्ध नेही।घर जाकर उन्होंने पारी-पारी से अपने माता-पिता,स्त्री तथा कुटुम्बीयों से पुछा-'तुम हमारे पाप के हिस्सेदार हो या नहीँ" ,सभी ने एक स्वर से कहा"हमे खिलाना पिलाना तुम्हारा कर्तव्य है।हम क्या जानें कि तुम किस प्रकार धन लाते हो, हम तुम्हारे पापों के हिस्सेदार नहीँ।" जिनके लिए वे निर्दयता से प्राणियों का वध करते रहे उनका ऐसा उत्तर सुनकर वाल्मीकि जी के ज्ञाननेत्र खुल गये।देवर्षि का उतदेश पाकर वे निरन्तर एकाग्रचित से "मरा-मरा" जपने लगे ।हज़ारों वर्षों तक एक ही जगह बैठकर वे नाम की रतन में निमग्न हो गये।उनके सम्पूर्ण शरीर पर दीमक का पहाड़ सा जम गया।दीमको के घर को वल्मीक कहते है उसमें रहने के कारण ही इनका नाम वाल्मीकि पड़ा।पहले इनका नाम रत्नाकर था।ये ही संसार में लौकिक छन्दों के कवि हुए।इन्होंने ही श्रीबाल्मीकीय आदि काव्य की रचना की।
हे रामजी !!तुम्हारे नामकी महिमा को कौन कह सकता है,जिसके प्रभावसे मैंने ब्रह्मार्षि पद प्राप्त कर लिया।।
थोड़ी बिस्तार से---
दर्शन धार्मिक आन्दोलन जिसे वाल्मीकिशास्त्र कहते हैं वो वाल्मीकिके कलामे आधिरित हैं ।
खिताब/सम्मान दिपान्शु कुलश्रेष्ठ
रामायण तथा योग वासिष्ठके रचनाकार
वाल्मीकि (/vɑːlˈmiːki/;[1] संस्कृत: वाल्मीकि Vālmīki)[2] प्राचीन भारतीय महर्षि हैं। ये आदिकवि के रुप में प्रसिद्ध हैं। उन्होने संस्कृत मे रामायण की रचना की। उनके द्वारा रची रामायण वाल्मीकि रामायण कहलाई। रामायण एक महाकाव्य है जो कि श्रीराम के जीवन के माध्यम से हमें जीवन के सत्य से, कर्तव्य से, परिचित करवाता है।
दस्यु से महर्षि का परिवर्तन --
महर्षि वाल्मीकि का जन्म नागा प्रजाति में हुआ था। महर्षि बनने के पहले वाल्मीकि रत्नाकर के नाम से जाने जाते थे। वे परिवार के पालन-पोषण हेतु दस्युकर्म करते थे। एक बार उन्हें निर्जन वन में नारद मुनि मिले। जब रत्नाकर ने उन्हें लूटना चाहा, तो उन्होंने रत्नाकर से पूछा कि यह कार्य किसलिए करते हो, रत्नाकर ने जवाब दिया परिवार को पालने के लिये। नारद ने प्रश्न किया कि क्या इस कार्य के फलस्वरुप जो पाप तुम्हें होगा उसका दण्ड भुगतने में तुम्हारे परिवार वाले तुम्हारा साथ देंगे। रत्नाकर ने जवाब दिया पता नहीं, नारदमुनि ने कहा कि जाओ उनसे पूछ आओ। तब रत्नाकर ने नारद ऋषि को पेड़ से बाँध दिया तथा घर जाकर पत्नी तथा अन्य परिवार वालों से पूछा कि क्या दस्युकर्म के फलस्वरुप होने वाले पाप के दण्ड में तुम मेरा साथ दोगे तो सबने मना कर दिया। तब रत्नाकर नारदमुनि के पास लौटे तथा उन्हें यह बात बतायी। इस पर नारदमुनि ने कहा कि हे रत्नाकर यदि तुम्हारे घरवाले इसके पाप में तुम्हारे भागीदार नहीं बनना चाहते तो फिर क्यों उनके लिये यह पाप करते हो। यह सुनकर रत्नाकर को दस्युकर्म से उन्हें विरक्ति हो गई तथा उन्होंने नारदमुनि से उद्धार का उपाय पूछा। नारदमुनि ने उन्हें राम-राम जपने का निर्देश दिया।
रत्नाकर वन में एकान्त स्थान पर बैठकर राम-राम जपने लगे लेकिन अज्ञानतावश राम-राम की जगह मरा-मरा जपने लगे। कई वर्षों तक कठोर तप के बाद उनके पूरे शरीर पर चींटियों ने बाँबी बना ली जिस कारण उनका नाम वाल्मीकि पड़ा। कठोर तप से प्रसन्न होकर ब्रह्मा जी ने इन्हें ज्ञान प्रदान किया तथा रामायण की रचना करने की आज्ञा दी। ब्रह्मा जी की कृपा से इन्हें समय से पूर्व ही रामायण की सभी घटनाओं का ज्ञान हो गया तथा उन्होंने रामायण की रचना की। कालान्तर में वे महान ऋषि बने।
हालकि महर्षि वाल्मीकि ने रामायण मे स्वयं कहा है कि :
प्रेचेतसोंह दशमाः पुत्रों रघवनंदन। मनसा कर्मणा वाचा, भूतपूर्व न किल्विषम्।।
हे राम मै प्रचेता मुनि का दसवा पुत्र हू और राम मैंने अपने जीवन में कभी भी पापाचार कार्य नहीं किया है।
जिससे कि रत्नाकर की कहानी मिथ्या ही प्रतीत होती है क्योकि ऐसा ऋषि जिसके पिता स्वयं एक मुनि हो तो भला वह डाकू कैसे बन सकता है और वह स्वयं राम के सामने सीता जी की पवित्रता के बारे मे रामायण जैसी रचना मे अपना परिचय देता है तो वह गलत प्रतीत नहीं होता। [3]
आदिकवि शब्द 'आदि' और 'कवि' के मेल से बना है। 'आदि' का अर्थ होता है 'प्रथम' और 'कवि' का अर्थ होता है 'काव्य का रचयिता'। वाल्मीकि ऋषि ने संस्कृत के प्रथम महाकाव्य की रचना की थी जो रामायण के नाम से प्रसिद्ध है। प्रथम संस्कृत महाकाव्य की रचना करने के कारण वाल्मीकि आदिकवि कहलाये।
आदि कवि वाल्मीकि----
एक बार महर्षि वाल्मीकि एक क्रौंच पक्षी के जोड़े को निहार रहे थे। वह जोड़ा प्रेमालाप में लीन था, तभी उन्होंने देखा कि एक बहेलिये ने कामरत क्रौंच (सारस) पक्षी के जोड़े में से नर पक्षी का वध कर दिया और मादा पक्षी विलाप करने लगी। उसके इस विलाप को सुन कर महर्षि की करुणा जाग उठी और द्रवित अवस्था में उनके मुख से स्वतः ही यह श्लोक फूट पड़ाः
मा निषाद प्रतिष्ठां त्वमगमः शाश्वतीः समाः।
यत्क्रौंचमिथुनादेकम् अवधीः काममोहितम्॥'
((निषाद)अरे बहेलिये, (यत्क्रौंचमिथुनादेकम् अवधीः काममोहितम्) तूने काममोहित मैथुनरत क्रौंच पक्षी को मारा है। जा तुझे कभी भी प्रतिष्ठा की प्राप्ति नहीं (मा प्रतिष्ठा त्वगमः) हो पायेगी)
ज्ञान प्राप्ति के बाद उन्होंने प्रसिद्ध महाकाव्य "रामायण" (जिसे कि "वाल्मीकि रामायण" के नाम से भी जाना जाता है) की रचना की और "आदिकवि वाल्मीकि" के नाम से अमर हो गये।
अपने महाकाव्य "रामायण" में अनेक घटनाओं के घटने के समय सूर्य, चंद्र तथा अन्य नक्षत्र की स्थितियों का वर्णन किया है। इससे ज्ञात होता है कि वे ज्योतिष विद्या एवं खगोल विद्या के भी प्रकाण्ड पण्डित थे।
अपने वनवास काल के मध्य "राम" वाल्मीकि ऋषि के आश्रम में भी गये थे।
देखत बन सर सैल सुहाए। बालमीक आश्रम प्रभु आए॥
तथा जब "राम" ने अपनी पत्नी सीता का परित्याग कर दिया तब वाल्मीकि ने ही सीता को प्रश्रय दिया था।
उपरोक्त उद्धरणों से सिद्ध है कि वाल्मीकि "राम" के समकालीन थे तथा उनके जीवन में घटित प्रत्येक घटनाओं का पूर्णरूपेण ज्ञान वाल्मीकि ऋषि को था। उन्हें "राम" का चरित्र को इतना महान समझा कि उनके चरित्र को आधार मान कर अपने महाकाव्य "रामायण" की रचना की।
जीवन परिचय---
हिंदुओं के प्रसिद्ध महाकाव्य वाल्मीकि रामायण, जिसे कि आदि रामायण भी कहा जाता है और जिसमें भगवान श्रीरामचन्द्र के निर्मल एवं कल्याणकारी चरित्र का वर्णन है, के रचयिता महर्षि वाल्मीकि के विषय में अनेक प्रकार की भ्रांतियाँ प्रचलित है जिसके अनुसार उन्हें निम्नवर्ग का बताया जाता है जबकि वास्तविकता इसके विरुद्ध है। ऐसा प्रतीत होता है कि हिंदुओं के द्वारा हिंदू संस्कृति को भुला दिये जाने के कारण ही इस प्रकार की भ्रांतियाँ फैली हैं। वाल्मीकि रामायण में स्वयं वाल्मीकि ने श्लोक संख्या ७/९३/१६, ७/९६/१८ और ७/१११/११ में लिखा है कि वे प्रचेता के पुत्र हैं। मनुस्मृति में प्रचेता को वशिष्ठ, नारद, पुलस्त्य आदि का भाई बताया गया है। बताया जाता है कि प्रचेता का एक नाम वरुण भी है और वरुण ब्रह्माजी के पुत्र थे। यह भी माना जाता है कि वाल्मीकि वरुण अर्थात् प्रचेता के 10वें पुत्र थे और उन दिनों के प्रचलन के अनुसार उनके भी दो नाम 'अग्निशर्मा' एवं 'रत्नाकर' थे।
प्रेचेतसोंह दशमाः पुत्रों रघवनंदन। मनसा कर्मणा वाचा, भूतपूर्व न किल्विषम्।।
भगवान् वाल्मीकि जी ने रामायण में राम को सम्बोधित करते हुए लिखा है कि हे, राम मैंने अपने जीवन में कभी भी पापाचार कार्य नहीं किया है।
भगवान वाल्मीकि के पिता का नाम वरुण और मां का नाम चार्षणी था। वह अपने माता-पिता के दसवें पुत्र थे। उनके भाई ज्योतिषाचार्य भृगु ऋषि थे। महर्षि कश्यप और अदिति के नौवीं संतान थे पिता वरुण। वरुण का एक नाम प्रचेता भी है, इसलिए वाल्मीकि प्राचेतस नाम से भी विख्यात हैं।
मत्स्य पुराण में भगवान वाल्मीकि को भार्गवसप्तम् नाम से स्मरण किया जाता है, तथा भागवत में उन्हें महायोगी कहा गया है। सिखों के दसवें गुरु गोविन्द सिंह द्वारा रचित दशमग्रन्थ में वाल्मीकि को ब्रह्मा का प्रथम अवतार कहा गया है।
परम्परा में महर्षि वाल्मीकि को कुलपति कहा गया है। कुलपति उस आश्रम प्रमुख को कहा जाता था जिनके आश्रम में शिष्यों के आवास, भोजन, वस्त्र, शिक्षा आदि का प्रबंध होता था। वाल्मीकि का आश्रम गंगा नदी के निकट बहने वाली तमसा नदी के किनारे पर स्थित था।
वाल्मीकि का नाम वाल्मीकि कैसे पड़ा इसकी एक रोचक कथा है। वाल्मीकि ने पूरी तरह़ भगवान से लौ लगाई और ईश्वर में तल्लीन रहने लगे। एक बार जब वह घोर तपस्या में लीन थे, उनके समाधिस्थ शरीर पर दीमकों ने अपनी बाम्बियां बना लीं। दीमकों की बाम्बियों को संस्कृत में वाल्मीक कहा जाता है। लेकिन वाल्मीकि को इसका आभास तक नहीं हुआ और वह तपस्या में मगन रहे और उसी अवस्था में आत्मज्ञानी हो गए। आखिरकार, आकाशवाणी हुई, ‘तुमने ईश्वर के दर्शन कर लिए हैं। तुम्हें तो इसका ज्ञान तक नहीं है कि दीमकों ने तुम्हारी देह पर अपनी बाम्बियां बना ली हैं। तुम्हारी तपस्या पूर्ण हुई। अब से तुम्हें संसार में वाल्मीकि के नाम से जाना जाएगा।
[4]
भगवान वाल्मीकि के जीवन में दो महत्वपूर्ण घटनाएं हुईं जिन्होंने न केवल उनके अन्तर्मन को हिला कर रख दिया बल्कि ये रामायण के आविर्भाव और रामायण के अंतिम काण्ड उत्तरण्ड की आधारशिला बनीं।
पहली घटना इस प्रकार है। एक बार सुबह के स्नान के लिए वाल्मीकि तमसा नदी की ओर जा रहे थे, साथ में उनके प्रमुख शिष्य भरद्वाज भी थे। उन्होंने नदी के किनारे कामरत क्रौन्च (सारस ) पक्षी का एक जोड़ा देखा। तभी वहां एक शिकारी आया और कामक्रीड़ारत जोड़े में से नर पक्षी को बाण से मार गिराया। अकस्मात हुए इस हादसे से अकेली पड़ गई मादा विछोह न सह सकी और भूमि पर पड़े अपने नर के चारों तरफ घूम-घूम कर विलाप करने और अंततः अपने प्राण त्याग दिए। इस हृदयविदारक दृश्य को देख कर अभिभूत वाल्मीकि के मुख से यह श्लोक उच्चारित हुआ:-
मा निषाद प्रतिष्ठां त्वमगमाः शाश्वतीः सभाः।
यत्क्रौन्चमिथुनादेकमवधी काममोहितम्।।
(वा. रामा. बालकाण्ड, संर्ग 2 श्लोक 15)
इसका अर्थ है, निषाद (व्याध या शिकारी) को मानो श्राप देते हुए वाल्मीकि ने कहा, ‘अरे! ओ शिकारी, तूने काममोहित क्रौन्च जोड़े में से एक को मार डाला, जा तुझे कभी चैन नहीं मिलेगा।’ इसी श्लोक के गर्भ से रामायण महाकाव्य की रचना निकली। हुआ यह कि वाल्मीकि उद्वेग में उक्त श्लोक तो बोल गए, लेकिन वैदिक मंत्रों को सुनने तथा बोलने के अभ्यस्त वह सोचने लगे कि उनके मुंह से यह क्या निकल गया? उन्होंने अपने शिष्य भरद्वाज से कहा, ‘मेरे शोकाकुल हृदय से जो सहसा शब्दों में अभिव्यक्त हुआ है, उसमें चार चरण हैं, हर चरण में अक्षर बराबर संख्या में हैं और उनमें मानो मंत्र की लय गूंज रही है। अर्थात् इसे गाया जा सकता है।
लेकिन, भरद्वाज से अपनी बात कहने के बाद भी वाल्मीकि का मनोमंथन चलता रहा औ
लेकिन, भरद्वाज से अपनी बात कहने के बाद भी वाल्मीकि का मनोमंथन चलता रहा और वह उसी में तल्लीन थे कि ब्रह्मा जी उनके पास आए और उनसे कहा, यह अनुष्टप छंद में श्लोक है और उनसे अनुरोध किया वह इसी छंद में राम-कथा लिखें।
भगवान् वाल्मीकि जी त्रेता युग के तिर्कालदर्शी ऋषि थे और अपने अन्तःचक्षुओं तथा बाह्य चक्षुओं से राम के वनगमन से रावण का वध कर सीता को साथ ले अयोध्या वापस आने तक लीला देख चुके थे। फलस्वरूप उन्होंने रामायण रची और उसके माध्यम से संस्कृति, मर्यादा व जीवनपद्धति को गढ़ा। और, इस तरह भगवान वाल्मीकि पहले आदि कवि भी बने।
भगवान वाल्मीकि के जीवन में दूसरी महत्वपूर्ण घटना तब घटी जब लोकनिन्दा के डर से राम ने गर्भवती सीता को त्याग दिया और राम के आदेश पर लक्ष्मण उन्हें तमसा नदी के किनारे छोड़ आए। नदी के किनारे असहाय बैठी सीता का रोना रुक ही नहीं रहा था। उनकी इस हालत की सूचना मुनि-कुमारों के ज़रिए वाल्मीकि तक पहुंची। वह स्वयं तट पर पहुंचे और विकल-बेहाल सीता को देखा। वह अपने दिव्य चक्षुओं से पूरी घटना को जान चुके थे। उनका पितृत्व जागा और उन्होंने वात्सल्य से सीता के सिर पर हाथ फेरा और आश्वासन दिया कि वह पुत्रीवत् उनके आश्रम में आकर रहें। सीता चुपचाप उनके साथ चल कर आश्रम पहुंची और रहने लगीं। समय आने पर सीता ने दो पु़त्रों लव और कुश को जन्म दिया। इन पुत्रों की शिक्षा-दीक्षा सम्भाली वाल्मीकि ने और उन्हें न केवल शस्त्र और शास्त्र विद्याओं में निपुण बनाया, बल्कि राम-रावण युद्ध और बाद में सीता के साथ अयोध्या वापसी, सीता के वनवास और सीता के पुत्रों के जन्म तक पूरी रामायण कंठस्थ करा दी। यही नहीं सीता के आश्रम आगमन के बाद उन्होंने रामायण को आगे लिखना भी शुरू कर दिया और इस खण्ड को नाम दिया उत्तरकाण्ड।
जब राम ने राजसूय यज्ञ शुरू किया तो यज्ञ का घोड़ा वाल्मीकि के आश्रम स्थल से भी गुज़रा। जिस घोड़े को तब तक कोई राजा नहीं रोक सका था, उसे लव-कुश ने रोका और उसके साथ चल रहे लक्ष्मण तथा हनुमान भी उनसे मुकाबला नहीं कर सके। वापस होकर लक्ष्मण और हनुमान ने इन दो ऋषि वेशधारी कुमारों के साहस की कथा राम को सुनाई। जिज्ञासा वश राम ने उन्हें अपने दरबार में बुलाया और परिचय पूछा। वाल्मीकि के साथ दरबार में पहुंचे लव-कुश ने, वाल्मीकि के आदेश को मानते हुए, अपना परिचय उनके (वाल्मीकि के) शिष्यों के रूप दिया और सीता के परित्याग तक पूरी राम कथा उन्हें गाकर सुनाई। स्वयं वाल्मीकि ने सीता की शुचिता (पवित्रता) की घोषणा की और राम से कहा कि उन्होंने हज़ारों वर्ष तक गहन तपस्या की है और यदि मिथिलेशकुमारी सीता में कोई भी दोष हो उन्हें उस तपस्या का फल न मिले।
इसके बाद राम ने सीता से लौट आने व राजमहल में रहने की प्रार्थना की। लेकिन सीता ने विकल होकर धरती माता से उनकी गोद में पनाह देने की गुहार लगाई और उसमें समा गईं।
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