02. कुलदेवता’ शब्द की व्युत्पत्ति एवं अर्थ
कुलदेवता’ शब्द की व्युत्पत्ति एवं अर्थ*
*१.कुल अर्थात आप्तसंबंधों से एकत्र आए एवं एक रक्त-संबंध के लोग । जिस कुलदेवता की उपासना आवश्यक होगी, उस कुल में व्यक्ति जन्म लेता है*
*२.कुल अर्थात मूलाधारचक्र, शक्ति अथवा कुंडलिनी । कुल + देवता अर्थात ऐसे देवता जिसकी उपासना से मूलाधारचक्र में विद्यमान कुंडलिनीशक्ति जागृत होती है तथा आध्यात्मिक प्रगति आरंभ होती है । कुलदेवता, अर्थात कुलदेव अथवा कुलदेवी, दोनों।*
*२. कुलदेवताकी उपासना का इतिहास*
*कुलदेवताकी उपासनाका आरंभ वेदोत्तर एवं पुराणपूर्व कालमें हुआ । कुलदेवताकी साधनाद्वारा आध्यात्मिक एवं व्यावहारिक उन्नति करनेवाले एक सिद्ध उदाहरण हैं छत्रपति शिवाजी महाराज । शिवाजी महाराजके गुरु समर्थ रामदासस्वामीजीने उन्हें उनकी कुलदेवी भवानीमाताकी ही उपासना बताई थी । संत तुकाराम महाराजने जिस पांडुरंगकी अनन्यभक्ति कर सदेह मुक्ति प्रप्त की, वह विठोबा उनके कुलदेवता ही थे ।*
*३. कुलदेवता का नामजप करने का महत्व*
*अ. हम गंभीर रोगों में स्वयं निर्धारित औषधि नहीं लेते । ऐसे में उस क्षेत्र के अधिकारी व्यक्ति अर्थात, डॉक्टर के पास जाकर उनके परामर्शनुसार औषधि लेते हैं । उसी प्रकार भवसागर के गंभीर रोगों से बचने हेतु अर्थात, अपनी आध्यात्मिक उन्नति के लिए, आध्यात्मिक दृष्टि से उन्नत व्यक्तियों के मार्गदर्शन अनुसार साधना करना आवश्यक है; परंतु ऐसे उन्नत व्यक्ति समाज में बहुत अल्प होते हैं । ९८ प्रतिशत तथाकथित गुरु वास्तव में गुरु होते ही नहीं । अतः यह प्रश्न उठता है कि कौनसा नाम जपना चाहिए; परंतु इस संदर्भ में भी प्रत्येक को उसकी उन्नति हेतु आवश्यक, ऐसे उचित कुल में ही भगवान ने जन्म दिया है ।*
*अा. अस्वस्थ होने पर हम अपने फैमिली डॉक्टर के पास जाते हैं, क्योंकि उन्हें हमारी शरीरप्रकृति एवं रोग की जानकारी रहती है । यदि किसी कार्यालय में शीघ्र काम करवाना हो, तो हम परिचित व्यक्तिद्वारा काम करवा लेते हैं । उसी प्रकार अनेक देवताओं में से कुलदेवता ही हमें अपने लगते हैं । वे हमारी पुकार सुनते हैं एवं आध्यात्मिक उन्नति हेतु उत्तरदायी होते हैं ।*
*इ. जब ब्रह्मांड के सर्व तत्त्व पिंड में लाए जाते हैं, तब साधना पूर्ण होती है । सर्व प्राणियों में से केवल गाय में ही ब्रह्मांड के सर्व देवताओं की स्पंदन-तरंगें ग्रहण करने की क्षमता है । (इसीलिए गाय के उदर में तैंतीस करोड देवता वास करते हैं, ऐसा कहा जाता है ।) उसी प्रकार ब्रह्मांड के सर्व तत्त्वों को आकर्षित कर, उन सभी में ३० प्रतिशत वृद्धि करने का सामर्थ्य केवल कुलदेवता के जप में है । इसके विपरीत श्रीविष्णुु, शिव, श्री गणपति आदि देवताओं का नामजप केवल विशिष्ट तत्त्व की वृद्धि हेतु है, जैसे शक्तिवर्धक के रूप में जीवनसत्त्व अ, ब (विटामिन ए, बी) इत्यादि लेते हैं ।*
*४. कुलदेवता का रुष्ट होना*
*यदि कोई विद्यार्थी बुद्धिमान होेते हुए भी पढाई न करता हो, तो पाठशाला में शिक्षक उसे डांटते हैं । उसी प्रकार आध्यात्मिक उन्नति करने की क्षमता होने पर भी यदि कोई व्यक्ति साधना नहीं करता, तो कुलदेवता उस पर क्रोधित होते हैं; परंतु सामान्यतः उस व्यक्ति को इस क्रोध का भान नहीं होता, इसलिए कुलदेवता कुछ व्यावहारिक अडचनें उत्पन्न करते हैं बहुत प्रयत्न करने पर भी उन अडचनों का निराकरण न कर पाने पर, वह व्यक्ति किसी उन्नत पुरुष से (संत अथवा गुरुसे) पूछताछ करता है । उन्नत पुरुषद्वारा कुलदेवता की उपासना बताए जाने पर एवं उसके अनुसार उपासना आरंभ करने पर कुलदेवता अडचनों का निराकरण करते हैं एवं उपासना में सहायता भी करते हैं ।*
*५. किसका नामजप करना चाहिए – कुलदेवता का अथवा कुलदेवी का ?*
*१.केवल कुलदेवता होने पर उन्हींका एवं केवल कुलदेवी के होने पर कुलदेवी का नामजप करना चाहिए ।*
*२. यदि किसी के कुलदेव एवं कुलदेवी दोनों हों, तो उन्हें कुलदेवी का जप करना चाहिए । इसके निम्नलिखित कारण हैं ।*
*अ. बचपन में माता-पिता दोनों के होते हुए हम माता के साथ ही अधिक हठ करते हैं, क्योंकि मां हमारे हठ को शीघ्र पूर्ण कर देती है । उसी प्रकार, कुलदेवता की अपेक्षा कुलदेवी शीघ्र प्रसन्न होती हैं ।*
*आ. कुलदेवता की अपेक्षा कुलदेवी पृथ्वीतत्त्व से अधिक संबंधित होती हैं ।*
*इ. आध्यात्मिक प्रगति के लिए परात्पर गुरु का दिया नाम १०० प्रतिशत, कुलदेवी का ३० प्रतिशत तो कुलदेवता का नाम २५ प्रतिशत पूरक होता है ।*
*६. कुलदेवताका नामजप करनेकी पद्धति*
*कुलदेवताके नामसे पूर्व ‘श्री’ लगाएं, नामको संस्कृत व्याकरणानुसार चतुर्थीका त्यय लगाएं एवं अंतमें ‘नमः’ बोलें, उदा. कुलदेवता गणेश हों, तो ‘श्री गणेशाय नमः ।’, कुलदेवी दुर्गा हों, तो ‘श्री दुर्गायै नमः ।’ बोलना कठिन है, इसलिए ‘देव्यै’ त्यय लगाकर ‘श्री दुर्गादेव्यै नमः ।’ बोलें ।*
*७. नामजप कितना करना चाहिए ?*
*कुलदेवता का नामजप प्रतिदिन न्यूनतम १ से २ घंटे एवं अधिकतम अर्थात निरंतर करना चाहिए ।*
*८. कुलदेवता के नामजप संबंधी प्रायः पूछे जानेवाले प्रश्न*
*८ अ. कुलदेवता यदि ज्ञात न हो, तो क्या करें ?*
*यदि कुलदेवता ज्ञात न हो तो कुटुंब के ज्येष्ठ, अपने उपनामवाले बंधु, जातिबंधु, गांव के लोग, पुरोहित इत्यादि से कुलदेवता की जानकारी प्राप्त करने का प्रयत्न करें । कुलदेवता के संदर्भ में जानकारी न मिलने से इष्टदेवता के नामका जप करना चाहिए अथवा ‘श्री कुलदेवतायै नमः ।’ यह जप करना चाहिए । यह जप पूर्ण होते ही कुलदेवता का नाम बतानेवाले मिलते हैं । देवता के रूप की कल्पना न होने के कारण मात्र ‘श्री कुलदेवतायै नमः ।’ ऐसा जप करना, अधिकांश लोगों के लिए कठिन हो जाता है । इसके विपरीत, प्रिय देवता को रूप ज्ञात होने के कारण उनका जप करना सहज लगता है ।*
*८ आ. कुलदेवता का नामजप करने से क्या लाभ होता है ?*
*कुलदेवता का आवश्यक जप पूर्ण होने पर गुरु साधक के जीवन में स्वयं आकर गुरुमंत्र देते हैं ।*
*८ इ. कुलदेवता यदि श्री गणेश-पंचायतन जैसे हो, तो नामजप कैसे करें ?*
*किसी के कुलदेवता श्री गणेश-पंचायतन अथवा श्रीविष्णुु-पंचायतन (पंचायतन अर्थात पांच देवता) इस प्रकार के हों, तो पंचायतन के प्रमुख देवता को क्रमशः श्री गणेश अथवा श्रीविष्णुु को ही कुलदेवता मानें ।*
*८ र्इ. विवाहित स्त्री ससुराल के अथवा मायके के कुलदेवता का नाम जपें ?*
*सामान्यतः विवाहोपरांत स्त्री का नाम परिवर्तित होता है । मायके का सबकुछ त्यागकर स्त्री ससुराल आती है । एक अर्थ से यह उसका पुनर्जन्म ही होता है; इसीलिए विवाहित स्त्री को अपने ससुराल के कुलदेवता का जप करना चाहिए । यदि कोई स्त्री बचपन से ही नामजप करती हो एवं प्रगत साधक हो, तो विवाह के पश्चात भी वही नामजप जारी रखने में कोई हानि नहीं । यदि गुरु ने किसी स्त्री को उसके विवाहपूर्व नामजप दिया हो, तो उसे वही नाम जपना चाहिए ।*
*अगर आप नहीं जानते कि आपकी कुलदेवी कौन है, तो भी आप कर सकते हैं अपनी कुलदेवी को प्रसन्न।*
*हिन्दू समाज में कुलदेवियों का विशिष्ट स्थान है। प्रत्येक हिन्दू वंश व कुल में कुलदेवी अथवा कुलदेवता की पूजा की परंपरा रही है। यह परंपरा हमारे पूर्वज ऋषि मुनियों द्वारा प्रारम्भ की गई थी जिसका उद्देश्य वंश कुल की रक्षा के लिए सुरक्षा चक्र का निर्माण था, जो वंश को नकारात्मक शक्तियों से बचाकर उन्नति की ओर अग्रसर कर सके। वर्तमान में अधिकतर हिन्दू परिवारों में लोग अपनी कुलदेवी को भूल चुके हैं जिसके कारण उनका सुरक्षा चक्र हट चुका है। अब उन तक विभिन्न बाधाएं बिना किसी रोक टोक के पहुँच रही हैं। परिणाम स्वरुप बहुत से परिवार परेशान है।*
*ऐसे लोगों के लिए एक पूजा-साधना हैं। जिसके माध्यम से आप अपनी कुलदेवी की कमी को पूरा कर सकते हैं और एक सुरक्षा चक्र का निर्माण आपके परिवार के आसपास हो जाएगा | घर में क्लेश, बार-बार होने वाली बिमारियों, उन्नति में होने बलि बाधाओं इत्यादि सभी समस्याओ के लिये कुलदेवी /कुल देवता साधना ही सर्वश्रेष्ठसाधना है। चूंकि अधिकतर कुलदेवता /कुलदेवी शिव कुल से सम्बंधित होते हैं ,अतः इस पूजा साधना में इसी प्रकार की ऊर्जा को दृष्टिगत रखते हुए साधना पद्धती अपनाई गयी है l*
*सामग्री--*
*४ पानी वाले नारियल,लाल वस्त्र ,१० सुपारिया ,८ या १६ शृंगार कि वस्तुये ,पान के १० पत्ते , घी का दीपक,कुंकुम ,हल्दी ,सिंदूर ,मौली ,पांच प्रकार कि मिठाई ,पूरी ,हलवा ,खीर ,भिगोया चना ,बताशा ,कपूर ,जनेऊ ,पंचमेवा।*
*साधना विधि-*
*सर्वप्रथम एक लकड़ी के बाजोट या चौकी पर लाल कपड़ा बिछाएं |उस पर चार जगह रोली और हल्दी के मिश्रण से अष्टदल कमल बनाएं |अब उत्तर की ओर किनारे के अष्टदल पर सफ़ेद अक्षत बिछाएं उसके बाद दक्षिण की ओर क्रमशः पीला ,सिन्दूरी और लाल रंग से रंग हुआ चावल बिछाएं |चार नारियल में मौली लपेटें |एक नारियल को एक तरफ किनारे सफ़ेद चावल के अष्टदल पर स्थापित करें |अब तीन नारियल में से एक नारियल को पूर्ण सिंदूर से रंग दे दूसरे को हल्दी और तीसरे नारियल को कुंकुम से,फिर ३ नारियल को मौली बांधे |इस तीन नारियल को पहले वाले नारियल के बायीं और क्रमशः अष्टदल पर स्थापित करें |प्रथम बिना रंगे नारियल के सामने एक पान का पत्ता और अन्य तीन नारियल के सामने तीन तीन पान के पत्ते रखें ,इस प्रकार कुल १० पान के पत्ते रखे जायेंगे |अब सभी पत्तों पर एक एक सिक्का रखें ,फिर सिक्कों पर एक एक सुपारियाँ रखें |प्रथम नारियल के सामने के एक पत्ते पर की सुपारी पर मौली लपेट कर रखें इस प्रकार की सुपारी दिखती रहे ,यह आपके कुल देवता होंगे ऐसी भावना रखें |अन्य तीन नारियल और उनके सामने के ९ पत्तों पर आपकी कुल देवी की स्थापना है | इनके सामने की सुपारियों को पूरी तरह मौली से लपेट दें |अब इनके सामने एक दीपक स्थापित कर दीजिये |*
*अब गुरुपूजन और गणपति पूजन संपन्न कीजिये | अब सभी नारियल और सुपारियों की चावल, कुंकुम, हल्दी ,सिंदूर, जल ,पुष्प, धुप और दीप से पूजा कीजिये | जहा सिन्दूर वाला नारियल है वहां सिर्फ सिंदूर ही चढ़े बाकि हल्दी कुंकुम नहीं |जहाँ कुमकुम से रंग नारियल है वहां सिर्फ कुमकुम चढ़े सिन्दूर नहीं |बिना रंगे नारियल पर सिन्दूर न चढ़ाएं ,हल्दी -रोली चढ़ा सकते हैं ,यहाँ जनेऊ चढ़ाएं ,जबकि अन्य जगह जनेऊ न चढ़ाए | इस प्रकार से पूजा करनी है | अब पांच प्रकार की मिठाई इनके सामने अर्पित करें |घर में बनी पूरी -हलवा -खीर इन्हें अर्पित करें |चना ,बताशा केवल रंगे नारियल के सामने अर्थात देवी को चढ़ाएं |आरती करें |साधना समाप्ति के बाद प्रसाद परिवार मे ही बाटना है| श्रृंगार पूजा मे कुलदेवी कि उपस्थिति कि भावना करते हुये श्रृंगार सामग्री तीन रंगे हुए नारियल के सामने चढा दे और माँ को स्वीकार करने की विनती कीजिये|*
*इसके बाद हाथ जोड़कर इनसे अपने परिवार से हुई भूलों आदि के लिए क्षमा मांगें और प्राथना करें की हे प्रभु ,हे देवी ,हे मेरे कुलदेवता या कुल देवी आप जो भी हों हम आपको भूल चुके हैं ,किन्तु हम पुनः आपको आमंत्रित कर रहे हैं और पूजा दे रहें हैं आप इसे स्वीकार करें |हमारे कुल -परिवार की रक्षा करें |हम स्थान ,समय ,पद्धति आदि भूल चुके हैं ,अतः जितना समझ आता है उस अनुसार आपको पूजा प्रदान कर रहे हैं ,इसे स्वीकार कर हमारे कुल पर कृपा करें |*
*यह पूजा नवरात्र की सप्तमी -अष्टमी और नवमी तीन तिथियों में करें |इन तीन दिनों तक रोज इन्हें पूजा दें ,जबकि स्थापना एक ही दिन होगी | प्रतिदिन आरती करें ,प्रसाद घर में ही वितरित करें ,बाहरी को न दें |सामान्यतय पारंपरिक रूप से कुलदेवता /कुलदेवी की पूजा में घर की कुँवारी कन्याओं को शामिल नहीं किया जाता और उन्हें दीपक देखने तक की मनाही होती है ,किन्तु इस पद्धति में जबकि पूजा तीन दिन चलेगी कन्याएं शामिल हो सकती हैं ,अथवा इस हेतु अपने कुलगुरु अथवा किसी विद्वान् से सलाह लेना बेहतर होगा |कन्या अपने ससुराल जाकर वहां की रीती का पालन करे |इस पूजा में चाहें तो दुर्गा अथवा काली का मंत्र जप भी कर सकते हैं ,किन्तु साथ में तब शिव मंत्र का जप भी अवश्य करें |वैसे यह आवश्यक नहीं है ,क्योकि सभी लोग पढ़े लिखे हों और सही ढंग से मंत्र जप कर सकें यह जरुरी नहीं |*
*साधना समाप्ति के बाद सपरिवार आरती करे | इसके बाद क्षमा प्राथना करें |तत्पश्चात कुलदेवता /कुलदेवी से प्राथना करें की आप हमारे कुल की रक्षा करें हम अगले वर्ष पुनः आपको पूजा देंगे ,हमारी और परिवार की गलतियों को क्षमा करें हम आपके बच्चे हैं |तीन दिन की साधना /पूजा पूर्ण होने पर प्रथम बिना रंगे नारियल के सामने के सिक्के सुपारी को जनेऊ समेत किसी डिब्बी में सुरक्षित रख ले |तीन रंगे नारियल के सामने की नौ सुपारियों में से बीच वाली एक सुपारी और सिक्के को अलग डिब्बी में सुरक्षित करें ,जिस पर लिख लें कुलदेवी |अगले साल यही रखे जायेंगे कुलदेवी /कुलदेवता के स्थान पर |अन्य वस्तुओं में से सिक्के और पैसे रुपये किसी सात्विक ब्राह्मण को दान कर दें |प्रसाद घर वालों में बाँट दें तथा अन्य सामग्रियां बहते जल अथवा जलाशय में प्रवाहित कर दें |*
*विशेष--*
*इस पद्धति का उद्देश्य ऐसे परिवारों को एक सुरक्षा कवच और कुलदेवी/कुलदेवता की एक सामान्य पूजा प्रदान करना है। यह पूजा पद्धति केवल मध्यम मार्ग के रूप में चुना गया है और ऐसे सामान्यजन के लाभार्थ प्रस्तुत है जो अपनी कुलदेवियों के बारे में अनजान हैं। यह सबके लिए उपयुक्त होगा।*
Comments
Post a Comment