01. गोत्र रखने के वैज्ञानिक कारण

01. गोत्र रखने के वैज्ञानिक कारण

किसी भी धार्मिक कार्य में गोत्र का ज्ञान होना बहुत आवश्यक है। इसी कड़ी में हम आपको बता रहे हैं कि गोत्र की वैज्ञानिकता क्या है और हमारे प्राचीन ऋषि-मुनियों ने क्यों इसकी व्यवस्था की है?

गोत्र रखने का पहला कारण : 
गोत्र को पहले पहल सामाजिक एकता का आधार हुआ करता था, लेकिन वर्तमान में ऐसे फालतू की वस्तु माना जाता है। चलिए जानने का प्रयास करते हैं कि गोत्र क्यों जरूरी था? 
वह इसलिए कि प्राचीन काल में वर्ण व्यवस्था जाति आधारित थी उस समय एक ही कुल से कोई ब्राह्मण होता था तो कोई क्षत्रिय, तो कोई वैश्य और कोई शूद्र कर्म करता था। ऐसे में गोत्र से ही उसकी पहचान होती थी। अब आप ही इसकी खोज कीजिए कि क्या कौरव और पांडव क्षत्रिय थे? क्या वाल्मीकि ब्राह्मण थे? वर्तमान युग के हिसाब से कृष्ण कौन थे? यह पक्के तौर पर कहा जा सकता है कि हमारे ऋषि-मुनि वर्तमान में प्रचलित किसी भी वर्ण या जाति के नहीं थे। पुराणों का पुनः लेखन तब किया गया जब जाति और वर्ण का बोलबाला था। पुराणों का पुनः लेखन बौद्धकाल में हुआ था।

पहले तो ऐसा था कि क्षत्रिय और ब्राह्मण आपस में विवाह करते थे, लेकिन गोत्र देखकर। और यदि क्षत्रिय का गोत्र भी भारद्वाज और ब्राह्मण का गोत्र भी भारद्वाज होता था तो यह विवाह नहीं होता था, क्योंकि ये दोनों ही भारद्वाज ऋषि की संतानें हैं। पहले ये चार वर्ण रंग पर आधारित थे फिर कर्म पर और बौद्धकाल में ये जाति पर आधारित हो गए। जब से ये जाति पर आधारित हुए हैं तबसे हिन्दू समाज का पतन होना शुरू हो गया।

गोत्र रखने का दूसरा कारण : 
गोत्र को शुरुआत से ही बहुत महत्व दिया जाता रहा है। बहुत से समाज ऐसे हैं, जो गोत्र देखकर ही विवाह करते हैं। आपने विज्ञान में पढ़ा होगा गुणसूत्र (Chromosome) के बारे में। गुणसूत्र का अर्थ है वह सूत्र जैसी संरचना, जो संतति में माता-पिता के गुण पहुंचाने का कार्य करती है।

गुणसूत्र की संरचना में दो पदार्थ विशेषत: संमिलित रहते हैं- (1) डिआक्सीरिबोन्यूक्लीइक अम्ल (Deoxryibonucleic acid) या डीएनए (DNA), तथा (2) हिस्टोन (Histone) नामक एक प्रकार का प्रोटीन। इसकी व्याख्या बहुत विस्तृत है। खैर..

प्रत्येक जोड़े में एक गुणसूत्र माता से तथा एक गुणसूत्र पिता से आता है। इस तरह प्रत्येक कोशिका में कुल 46 गुणसूत्र होते हैं जिसमें 23 माता व 23 पिता से आते हैं। जैसा कि कुल जोड़े 23 है। इन 23 में से एक जोड़ा लिंग गुणसूत्र कहलाता है। यह होने वाली संतान का लिंग निर्धारण करता है अर्थात पुत्र होगा या पुत्री।

यदि इस एक जोड़े में गुणसूत्र xx हो तो संतान पुत्री होगी और यदि xy हो तो संतान पुत्र होगी। परंतु दोनों में x समान है, जो माता द्वारा मिलता है और शेष रहा वो पिता से मिलता है। अब यदि पिता से प्राप्त गुणसूत्र x हो तो xx मिलकर स्त्रीलिंग निर्धारित करेंगे और यदि पिता से प्राप्त y हो तो पुल्लिंग निर्धारित करेंगे। इस प्रकार x पुत्री के लिए व y पुत्र के लिए होता है। इस प्रकार पुत्र-पुत्री का उत्पन्न होना माता पर नहीं, पूर्णतया पिता से प्राप्त होने वाले x अथवा y गुणसूत्र पर निर्भर होता है।

तो महत्वपूर्ण y गुणसूत्र हुआ, क्योंकि y गुणसूत्र के विषय में हम निश्चिंत हैं‍ कि यह पुत्र में केवल पिता से ही आया है। बस इसी y गुणसूत्र का पता लगाना ही गौत्र प्रणाली का एकमात्र उदेश्य था, जो हमारे ऋषियों ने जान लिया था। यह पूर्णत: एक वैज्ञानिक पद्धति थी। वैज्ञानिक कहते हैं कि गुणसूत्रों के बदलावा से कई तरह की बीमारियों का विकास होता है। इसलिए विवाह के दौरान जहां गोत्र देखा जाता है वहीं ज्योतिष पद्धति अनुसार गुणों का मिलान भी होता है।

वर्तमान के वैज्ञानिक गुणसूत्रों को बदलने का प्रयोग कर रहे हैं। उन्होंने इसके लिए पहले पेड़-पौधों, पशु-पक्षियों के गुणसूत्रों में बदलावा करके एक नई जाति बनाने का प्रयास किया है। मनुष्य के गुण सूत्रों के हेर-फेर से जो परिणाम सामने आए उनसे स्पष्ट है कि बिगाड़ने में अधिक और बनाने में कम सफलता मिली है

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